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________________ अर्थ- मिथ्यात्वादि सातगुणस्थानों में तथा उपशम-क्षपक श्रेणी संयुक्त ८-९-१० वे गुणस्थान में एवं उपशान्तकषाय से अयोगीगुणस्थानपर्यन्त अठारह आदि सत्त्वस्थानों में क्रम से ५०-१२-३६१२०-४८-४०-४०-२८-६२-२८-२४-८-४ और जानना । गुणस्थान * विशेषार्थ - मिथ्यात्वगुणस्थान के १८ सत्त्वस्थानों में ५०, सासादनगुणस्थान के ४ सत्त्वस्थानों में १२, मिश्रगुणस्थान के सस्था ३ अगस्थानी ४० सत्त्वस्थानों में १२० भन्न, देशसंयतगुणस्थान के ४० सत्त्वस्थानों के ४८ भन्न प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थान के ४०=४० स्थानों के ४०-४० भङ्ग, उपशम- क्षपकश्रेणीसम्बन्धी अपूर्वकरणगुणस्थान के ( २४+४) २८ सवस्थानों में २८ भंग, उपशम- क्षपकश्रेणी सम्बन्धी अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के (२४+३६) ६० सत्त्वस्थानों में ६२ भङ्ग, उपशमक्षपक श्रेणीसम्बन्धी सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान के (२४+४) २८ सत्त्वस्थानों में २८ भङ्ग, उपशान्तकषायगुणस्थान में २४ सत्त्वस्थानसम्बन्धी २४ भङ्ग, क्षीणकषायगुणस्थान में ८ सत्त्वस्थानों के ८ भङ्ग हैं, सयोगकेवली गुणस्थान के चार सत्त्वस्थानों में ४ भङ्ग तथा अयोगकेवलीगुणस्थान के ६ सत्त्वस्थानों में ८ भङ्ग हैं | गुणस्थानों में सत्त्वस्थान और भङ्गों की सन्दृष्टि सत्र स्थान भंग गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३४२ अब उपर्युक्त सत्त्वस्थानों में भङ्गों की संख्या कहते हैं १८ ܘ पण्णास बार छक्कदि, वीससयं अदाल दुसु दानं । अडवीसा बासट्ठी, अडचडवीसा य अट्ट चउ अट्ठ || ३६४ || と १२ ८ ४० ४० ४० ४० ३६ १२ ४८ ४० Xa अनिवृ २८ २४ ४ २४ ३६ २४ उप क्षप उप. क्षप उप. क्षप. सूक्ष्मसा. ६२ × २४ v २८ २४ ८ णिरियादिसु भुजेगं, बंधुदगं बारि बारि दोण्णेत्थ । पुणरुत्तसमविहीणा, आउगभंगा पज्जेव || ३६४ क ॥ णिरयतिरस्याणु, णेरइयणहाउ तिरियमणुय आऊ य । तेरिच्छिदेवाऊ, माणुसदेवाउ एगेगे || ३६४ ख | Jo ४ E ८
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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