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गाथा सं.
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विषय
५३६ तीर्थंकरप्रकृतिका उदय केवलीक ही होता है। ५८८-६०८ |५३६-५५३ नामकर्म के उदयस्थानों के भत्र शानि ६२ मिमिकमसत्त्वस्थामा
मनुष्यगत्यानुपूर्वीका क्षय अयोगीगुणस्थानके द्विचरमसमय या चरमसमयमें उद्वेलना, प्रकृति, ६१२-६१७ ५५८-५६० स्वामी व क्रम
| ५५९ वेदकयोग्यकाल, उपशमसम्यक्त्वयोग्यकाल ६१८-६१९ | ५६०-५६१ प्रथमोपशमसम्यक्त्व, वेदकसम्यक्च, देशसंयम, अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना, सकलसंयम
व उपशमणि कितनीचार ६२७-६२९ |५६४-५६६ | मूलप्रकृतिसम्बन्धी बन्धोदयसत्त्व भङ्ग ६३०-६३४ ५६७-५६८ | उत्तरप्रकृतियोंमें बन्धोदयसत्त्व भक ६३५-६३८ |५६९-५७० | गोत्रकर्मके त्रिसंयोगी भंग ६३९-६४९ | ५७१-५७५ | आयुकर्मक त्रिसंयोगीभ ६५०-६५२ | ५७७ वेदनीय-आयु-गोत्र इन तीनों गुणस्थानोंमें भंगोंकी संख्या ६५३-६९१ | ५७८-६०२ | मोहनीयकर्मक भंग गुणस्थानोंमें ६९२-७३१ ६०३-६२४ नामकर्मके बन्ध-उदय व सत्त्वसम्बन्धी त्रिसंयोनी भंग गुणस्थान व मार्गणाओंमें ७४०-७८४ ६२४-६६० नामकर्मके बन्ध आदिमें एकको आधार और दो को आधेय मानकर कथन
ॐ ६. बन्धप्रत्ययाधिकार के ७८५६६१ मंगलाचरण ७८६-७९० ६६१-६६३ प्रत्ययके भेद, गुणस्थानों में प्रत्यय क्षेपक ७ गाथा | ६६४-६६५ | प्रत्ययोंकी व्युच्छित्ति व अनुदयका कथन प्रा.पं.सं.की | ६६८-६७६ मार्गणाओंमें प्रत्यय क्षेपक १७ गाथा
| प्रत्ययोंके स्थान, स्थानोंके प्रकार, कूटप्रकार, कूटोच्चारण व भंग गुणस्थानोंमें प्रत्ययस्थान
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