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________________ (३६) गाथा सं. पृष्ठ सं. विषय ४७५-४८९ ४५२ ४७८ ४५६ ४९०-५०७ मोहनीयकर्मके उदयस्थान व उनके भंगों तथा प्रकृतियोंकी संख्या अनन्तानुबंधीके विसंयोजकके मिथ्यात्वमें आनेपर एक आवलीतक अनुदय | मोहनीयकर्मके उदयस्थानों व उनकी प्रकृतियोंका गुणस्थानोंमें उपयोग, योग, संयम, देशसंयम. लेश्या और सम्यक्त्वकी अपेक्षा कथन किरणास्थागमें लौन कौनसी लेश्या होती है? मोहनीयकर्मके सत्त्वस्थान | मोहनीयकर्भके बन्धस्थानोंमें सत्त्वस्थान नामकर्मसम्बन्धी स्थानोंके आधारभूत ४१जीवपदों का कथन . - ५०८-५१५ |४७९ ५१६-५१८ |४८४ ५१९-५२० | ४८७ ५२१ ४८७ ५२२-५२३ |४८८ गणस्थानोंम नामकर्मके बंधस्थानोंका कथन नामकर्मके अन्धस्थान कर्मपदका कथन |४८८ आतप औग, उद्योतप्रकति किस जीवपदके साथ बँधती है ? ५२५ | तीर्थंकर प्रकृतिका कौन जोव किसगति सहित बन्ध करते हैं? ५२६-५२९ |४८९ नामकर्मकी ध्रुवप्रकृतियाँ बंधस्थानोंके भेद बन्धस्थानोंके भग ५३८-५४३ क्रिसगतिका जीव मरकर कहाँ उत्पन्न होता है और क्या-क्या प्राप्त कर सकता है? ५४४-५५१ चौदहमार्गणाओंमें नामकर्भके बन्धस्थानोंका कथन | नामकर्म के बन्धस्थानोंमें पुनरुक्तभन्न ५५४-५५ व बन्धस्थानों में भुजकार, अल्पतर, अवस्थित और अबक्तल्वस्थानोंकी संख्या आदि, ५६३-५८२ | ५१९-५३३ | भुजकारादिके लक्षण | किस गुणस्थानसे गिरकर या चढ़कर किस-क्रिस गुणस्थानको प्राप्त हो सकता है? ५६०-५६१ ५१८ | किस-किस गुणस्थानवाले मरणको प्राप्त नहीं होते ? ५६२ | ५१८ | कृतकृत्यवेदककालके चारभागोंमें मरणकी व्यवस्था ५८३-५९८ ५३४-५४३ | नामकर्म के उदयस्थान ५८६-५८७ ५३५ केवलीसमुद्घातमें छहों पर्यानियाँ
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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