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गाथा सं.
पृष्ठ सं.
विषय
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४९०-५०७
मोहनीयकर्मके उदयस्थान व उनके भंगों तथा प्रकृतियोंकी संख्या
अनन्तानुबंधीके विसंयोजकके मिथ्यात्वमें आनेपर एक आवलीतक अनुदय | मोहनीयकर्मके उदयस्थानों व उनकी प्रकृतियोंका गुणस्थानोंमें उपयोग, योग, संयम, देशसंयम. लेश्या और सम्यक्त्वकी अपेक्षा कथन किरणास्थागमें लौन कौनसी लेश्या होती है? मोहनीयकर्मके सत्त्वस्थान | मोहनीयकर्भके बन्धस्थानोंमें सत्त्वस्थान नामकर्मसम्बन्धी स्थानोंके आधारभूत ४१जीवपदों का कथन
. - ५०८-५१५ |४७९ ५१६-५१८ |४८४ ५१९-५२० | ४८७ ५२१
४८७ ५२२-५२३ |४८८
गणस्थानोंम नामकर्मके बंधस्थानोंका कथन
नामकर्मके अन्धस्थान कर्मपदका कथन
|४८८
आतप औग, उद्योतप्रकति किस जीवपदके साथ बँधती है ?
५२५
| तीर्थंकर प्रकृतिका कौन जोव किसगति सहित बन्ध करते हैं? ५२६-५२९ |४८९ नामकर्मकी ध्रुवप्रकृतियाँ
बंधस्थानोंके भेद
बन्धस्थानोंके भग ५३८-५४३
क्रिसगतिका जीव मरकर कहाँ उत्पन्न होता है और क्या-क्या प्राप्त कर सकता है? ५४४-५५१
चौदहमार्गणाओंमें नामकर्भके बन्धस्थानोंका कथन
| नामकर्म के बन्धस्थानोंमें पुनरुक्तभन्न ५५४-५५ व
बन्धस्थानों में भुजकार, अल्पतर, अवस्थित और अबक्तल्वस्थानोंकी संख्या आदि, ५६३-५८२ | ५१९-५३३ | भुजकारादिके लक्षण
| किस गुणस्थानसे गिरकर या चढ़कर किस-क्रिस गुणस्थानको प्राप्त हो सकता है? ५६०-५६१ ५१८ | किस-किस गुणस्थानवाले मरणको प्राप्त नहीं होते ? ५६२ | ५१८ | कृतकृत्यवेदककालके चारभागोंमें मरणकी व्यवस्था ५८३-५९८ ५३४-५४३ | नामकर्म के उदयस्थान ५८६-५८७ ५३५ केवलीसमुद्घातमें छहों पर्यानियाँ