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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३१२
आगे क्षपक अनिवृत्तिकरणादि गुणस्थानों में क्षय (सत्त्व से व्युच्छित्ति) योग्य प्रकृतियों के नाम दो गाथाओं में कहते हैं
णिरियतिरिक्खदु वियलं श्रीणतिगुजोवतावएइंदी । साहरणसुहुमथावर, सोलं मज्झिमकसायङ्कं ॥ ३३८ ॥
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संदित्थि छक्कसाया, पुरिसो कोहो य माण मायं च ।
थूले सुहुमे लोहो, उदयं वा होदि खीणम्हि ॥ ३३९ || जुम्मं ॥
अर्थ - नरकगति- नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगति तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी विकलत्रय ३, स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा, उद्योत, आतप, एकेन्द्रिय, साधारण, सूक्ष्म और स्थावर ये १६ प्रकृतियाँ अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के प्रथमभाग में तथा अप्रत्याख्यान की चार कषाय, प्रत्याख्यानकी चार कषाय ये आठ दूसरे भाग में सत्ता से व्युच्छिन्न होती हैं। तृतीयभाग में नपुंसकवेद, चतुर्थभाग में स्त्रीवेद, पञ्चमभाग में हास्यादि ६ नोकषाय । छठेभाग में पुरुषवेद, सातवें भाग में सज्वलनक्रोध और आठवें भाग नै सक्नमान, नवभाग में सज्ज्वलनमाया । इस प्रकार अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में (१६+८+१+१+६+१+१+१+१) ३६ प्रकृतियों की सत्त्व से व्युच्छित्ति होती है। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में सज्वलन लोभ और क्षीणकषायगुणस्थान में उदयव्युच्छित्ति के समान ५ ज्ञानावरण, ४ दर्शनावरण, ५ अन्तराय, निद्रा और प्रचला इन १६ प्रकृतियों की सत्त्वव्युच्छित्ति है । सयोगकेवली के सत्त्वव्युच्छित्ति नहीं है।
अब अयोगकेवली गुणस्थान में सत्त्व से व्युच्छिन्न होनेवाली प्रकृतियों के नाम कहते हैंदेहादी फस्संता, थिरसुहसरसुरविहायदुग दुभगं । णिमिणाजसऽणादेज्जं, पत्तेया पुण्ण अगुरुचऊ ||३४०|| अणुदयतदियं णीचम- जोगिदुचरिमम्हि सत्तवोच्छिण्णा । उदयगबार णराणू, तेरस चरिमम्हि वोच्छिण्णा ॥ ३४९ ॥ जुम्मं ॥
अर्थ - पाँच शरीर, पाँच बन्धन, पाँच संघात, ६संस्थान, तीन अङ्गोपाङ्ग, ६ संहनन, पाँचवर्ण, दो गन्ध, पाँच रस, आठ स्पर्श, स्थिर - अस्थिर, शुभ-अशुभ, सुस्वर - दुःस्वर, देवगतिदेवगत्यानुपूर्वी, प्रशस्त - अप्रशस्तविहायोगति, दुर्भग, निर्माण, अयशस्कीर्ति, अनादेय, प्रत्येक, अपर्याप्त, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास तथा जिसका उदय नहीं पाया जाता ऐसी साता असाता में से एकवेदनीय और नीचगोत्र ये ७२ प्रकृतियाँ अयोगीगुणस्थान के द्विचरमसमय में सत्त्व से व्युच्छिन्न होती