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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३०८ ५ अनन्तानुबन्धीक्रोध-मान-माया-लोभ, सम्यकप्रकृति, सम्यग्मिध्यात्व तथा मिथ्यात्व इन सात प्रकृतियों का असंयतसम्यग्दृष्टि से अप्रमत्तसंयतगुणस्थान तक चार गुणस्थानों में रहने वाला कोई भी जीव उपशम करने वाला होता है। अपने स्वरूप को छोड़कर अन्यप्रकृतिरूप से रहना अनन्तानुबन्धी का उपशम है और उदय में नहीं आना ही दर्शनमोहनीय की तीन प्रकृतियों का उपशम है, क्योंकि उत्कर्षण, अपकर्षण और परप्रकृतिरूप से संक्रमण को प्राप्त और उपशान्त हुई उन तीनप्रकृतियों का अस्तित्व पाया जाता है। अपूर्वकरणगुणस्थान में एक भी कर्म का उपशम नहीं होता, किन्तु अपूर्वकरण गुणस्थानवालाजीव प्रत्येक समय में अनन्तगुणी विशुद्धि से बढ़ता हुआ एक-एक अन्तर्मुहूर्त में एकएक ग्धिनिरपड करता हु संख्याहहजार स्थितिखण्डों का घात करता है और उतने ही स्थिति बन्धापसरणों को करता है। तथा एक-एक स्थितिखण्ड के काल में संख्यातहजार अनुभागखण्डों का घात करता है और प्रतिसमय असंख्यातगुणित श्रेणीरूपसे प्रदेशों की निर्जरा करता है तथा जिन अप्रशस्तप्रकृतियों का बन्ध नहीं होता, उनकी कर्मवर्गणाओं को उससमय बंधनेवाली अन्यप्रकृतियों में असंख्यातगुणित श्रेणीरूप से संक्रमण कर देता है। इस प्रकार अपूर्वकरणगुणस्थान का उल्लंघन करके एवं अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में प्रवेश करके एक अन्तर्मुहूर्त पर्यन्त पूर्वोक्तविधि से रहता है। तत्पश्चात् एकअन्तर्मुहूर्त काल के द्वारा बारहकषाय और ९ नोकषाय का अन्तर (करण) करता है। (नीचे के व ऊपर के निषेकों को छोड़कर बीच के कितने ही निषेकों के द्रव्य को निक्षेपण करके बीच के निषेकों में से मोहनीयकर्म के अभाव करने को अन्तरकरण कहते हैं।) अन्तरकरणविधि हो जाने पर प्रथमसमय से लेकर ऊपर अन्तर्मुहूर्त जाकर असंख्यातगुणीश्रेणि के द्वारा नपुंसकवेद का उपशम करता है। शङ्का - उपशम किसे कहते हैं ? समाधान - उदय, उदीरणा, उत्कर्षण, अपकर्षण, परप्रकृतिसंक्रमण, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात के बिना ही कर्मों के सत्ता में रहने को उपशम कहते हैं। तदनन्तर एकअन्तर्मुहूर्त जाकर नपुसकवेद की उपशमविधि के समान ही स्त्रीवेद का उपशम करता है, पुन: एक अन्तर्मुहूर्त व्यतीत होने पर उसी विधि से पुरुष वेद के (एक समय कम दोआवलीमात्र नवकसमयप्रबद्ध को छोड़कर शेष सम्पूर्ण) प्राचीन सत्ता में स्थित कर्म के साथ छह नोकषाय का उपशम करता है। इसके आगे एक समय कम दो आवली प्रमाण काल के द्वारा पुरुषवेद के नवकसमयप्रबद्ध का उपशम करता है। इसके पश्चात् प्रत्येक समय में असंख्यातगुणीश्रेणी के द्वारा सञ्चलनक्रोध के एक समय कम दो आवली मात्र नवकसमयप्रबद्ध को छोड़कर सत्ता में स्थित पूर्वकर्मों के साथ अप्रत्याख्यान और प्रत्याख्यानक्रोध का एकअन्तर्महर्त में युगपत् ही उपशम करता है। इसके पश्चात् एक समय कम दो आवली में सवलनक्रोध के नवझसमयप्रबद्ध का उपशम करता है। तत्पश्चात् प्रतिसमय असंख्यातगुणी १. ध.. १५. २१०
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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