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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ३०७ विद्यमान जिस आयु को भोगाजावे वह भुज्यमान और आगामी काल के लिए जिसका बन्ध किया जावे वह बध्यमान कहलाती हैं। इन दोनों की अपेक्षा से नरकायु का सत्त्व होने पर जीव देशव्रत धारण नहीं कर र कर सकता तथा तिर्यञ्चायु का सत्त्व होने पर महाव्रत नहीं होता, देवायु का सत्त्व होने पर क्षपकश्रेणी नहीं चढ़ सकता तथा अनन्तानुबन्धीकषाय चार और दर्शनमोहनीय की तीन इस प्रकार इन ७ प्रकृतियों की सत्ता का नाश असंयतादि चार गुणस्थानों में से किसी एक गुणस्थान में करके क्षायिकसम्यदृष्टि होता है। अब इनके (उपर्युक्त ७ प्रकृतियों के) नाश का क्रम कहते हैं इन सप्तप्रकृतियों का नाश करते हुए सर्वप्रथम तीनकरण करता है उनमें से अनिवृत्तिकरण के अन्तर्मुहूर्तकाल के अन्तिम समय में अनन्तानुबन्धी चार कषाय की युगपत् विसंयोजना करता है अर्थात् अप्रत्याख्यान आदि १२ कषाय और ९ नोकषाय में से किन्हीं पाँच कपायरूप परिणमाता है। इसके पश्चात् अन्तर्मुहूर्त विश्राम करके पीछे दर्शनमोह के नाश के लिए उद्यम करके पहले अधः प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण ऐसे तीन करण करता है। यहाँ अनिवृत्तिकरण का जो अन्तर्मुहूर्तमात्र काल है उसमें संख्यात का भाग देकर उसमें से एक भाग बिना बहुभाग व्यतीत हो जाय तब उस एक भाग के प्रथम समय से क्रम से तीन प्रकृतियों का क्षय करता है। प्रथमसमय में मिथ्यात्वप्रकृति का क्षय करता है पश्चात् सम्यग्मिथ्यात्व का क्षय करता है। इसके अनन्तर सम्यक्त्वप्रकृति का क्षय करता है तब क्षायिकसम्यक्त्व को प्राप्त होता है। इसका विशेष कथन लब्धिसार क्षपणासारग्रन्थ में है तथा जयधवल पु० १३ में है । अब स्वयं नेमिचन्द्राचार्य क्षपकअनिवृत्तिकरणगुणस्थान में क्षययोग्य प्रकृतियों का क्रम कहते हैं सोलट्ठेक्किगिछक्कं चदुसेक्कं बादरे अदो एक्कं । खीणे सोलस जोगे, बावन्तरि तेरुवत्तंते ॥ ३३७ ॥ अर्थ - क्षपक अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के ९ भागों में क्रम से १६,८,९,१ और ६ तथा शेष चार भागों में एक - एक प्रकृति की सत्ताव्युच्छित्ति होती है। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में एक प्रकृति की, क्षीणकषाय में १६, सयोगीगुणस्थान में सत्त्वव्युच्छित्ति का अभाव तथा अयोगीगुणस्थान में अन्तिम दो समयों में से द्विचरमसमय में तो ७२ की और चरम समय में १३ प्रकृतियों की सत्त्व से व्युच्छित्ति होती विशेषार्थ - यहाँ सम्बन्ध प्राप्त उपशमन और क्षपणविधि कहते हैं, किन्तु उनमें भी सर्वप्रथम उपशमनविधि कहते हैं
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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