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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३०२
मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रकृति गुणस्थानोक्त ५ तथा स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा, परघात, उद्योत, उच्छ्वास, दु:स्वर, अप्रशस्तविहायोगति इस प्रकार १३ (क्योंकि स्त्यानगृद्धिआदि प्रकृतियों का उदय पर्याप्तअवस्था में होता है, किन्तु सासादनगुणस्थान असञ्जी के पर्याप्तअवस्था में नहीं होता अत; इनकी भी व्युच्छित्ति मिथ्यात्वगुणस्थान में ही हो जाती है।) मिथ्यात्वगुणस्थान में उदयप्रकृति ९१, अनुदय का अभाव है। सासादनगुणस्थान में गुणस्थानोक्त ९ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति, उदय ७८ प्रकृति का और अनुदय १३ प्रकृति का है। असञ्जीजीवों के उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि
उदययोग्यप्रकृति ९१, गुणस्थान २
उदयगुणस्थान
व्युच्छित्ति मिथ्यात्व । १३ ।
अ
उदय २१
| अनुदय
विशेष
. ।
| १३ (मिथ्यात्व, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त,
साधारण, स्त्यानगृद्धि आदि तीन निद्रा, परघात, उद्योत, उच्छ्वास, दुःस्वर और
अपशस्तविहायोगति) । १३ । ९ गुणस्थानोक्त(गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) ॥ इति सञ्जीमार्गणा ॥
सासादन
| ९
। ५८
अथ आहारमार्गणा अब आहारमार्गणा में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदय कहते हैं
आहारे सगुणोघं णवरि ण सव्वाणुपुव्वीओ ॥३३१।। कम्मे व अणाहारे पयडीणं उदयमेवमादेसे।
कहियमिणं बलमाहवचंदच्चियणेमिचंदेण ॥३३२।। अर्थ- आहारमार्गणा में आहारकअवस्था में उदयादि का कथन सामान्य से गुणस्थान के समान ही जानना, किन्तु विशेष यह है कि यहाँ चारों आनुपूर्वियों का उदय नहीं है अतः उदययोग्य प्रकृति ११८ ही हैं तथा अनाहारकअवस्था में कार्मणकाययोग के समान ८९ प्रकृतियों का उदय है। इस प्रकार मार्गणास्थानों में कर्मप्रकृतियों के उदयादि का कथन (अपने भाई) बलदेव और माधवचन्द्र से पूजित