SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 340
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३०१ w9 अपूर्वकरण । ६ । | ४१ ६ गाथा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार) अनिवृत्तिकरण | ६ । ६६ ४७ ६ (गाथा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार) सूक्ष्मसाम्पराय । १ । ५३ १ (गाधा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार) उपशान्तमोह । २ । | २ (गाथा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार) क्षीणमोह नोट-शङ्का- मनसहित होने के कारण सयोगकेवली भी सझी होते हैं ? समाधान- सयोगकेवली सञी नहीं होते, क्योंकि ज्ञानावरण व दर्शनावरण कर्म से रहित होने के कारण केवली के मन के अवलम्बन से बाह्य अर्थ का ग्रहण नहीं होता अतः केवली को सञ्जी नहीं कह सकते। शङ्का- तो केवली असञी रहे आवें ? समाधान- केवली असञ्जी भी नहीं हैं, क्योंकि जिन्होंने समस्त पदार्थों का साक्षात् कर लिया है उन्हें असञी मानने में विरोध आता है। शङ्का - केवली असझी होते हैं, क्योंकि वे मन की अपेक्षा के बिना ही विकलेन्द्रिय जीवों के समान बाह्य पदार्थ को ग्रहण करते हैं? समाधान- यदि मन की अपेक्षा न करके ज्ञान की उत्पत्ति मात्र का आश्रय करके असञीपना सम्भव होता, किन्तु ऐसा तो है नहीं। शङ्का- असञी के विषय में ऐसा क्यों कहा जाता है? समाधान- असञ्जीजीबों के मन का अभाव होने से अतिशय बुद्धि का भी अभाव है, किन्तु केवली के मन का अभाव होने से अतिशयबुद्धि के अभाव का दोष नहीं है अर्थात् केवली के मन का अभाव होते हुए भी अतिशयबुद्धि पाई जाती है अत: केवली असझी भी नहीं हैं। क्षायोपशमिक ज्ञान अवश्य ही कहीं पर (सञ्जी जीवों में) मन से उत्पन्न होता है इसलिए मन का अभाव होने से विशेष क्षायोपशमिक ज्ञान का अभाव सिद्ध होगा न कि केवलज्ञान का अभाव सिद्ध होगा अर्थात् केवली के मन का अभाव होने से अतिशयरूप केवलज्ञान का सद्भाव पाया जाता है। असझीमार्गणा में मनुष्यद्विक, उच्चगोत्र, देवगति, नरकगति, देवगत्यानुपूर्वी, नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअजोपाङ्ग, आदि के पाँच संहनन, आदि के ५ संस्थान, प्रशस्तविहायोगति, सुभगादि ३, नरक-मनुष्य और देवायु इन २६ प्रकृतियों को मिथ्यात्व गुणस्थानसम्बन्धी ११७ उदययोग्य प्रकृतियों में से घटाने पर शेष ९१ प्रकृतियाँ उदययोग्य हैं। गुणस्थान मिथ्यात्व और सासादन । यहाँ
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy