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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-३०३
(आचार्य) नेमिचन्द्र (सिद्धान्तचक्रवर्ती) ने कहा है। (यहाँ संस्कृत टीकाकार ने बलमाहवचंदच्चियणेमिचंदेण इस पद का बलभद्र और माधव (नारायण) से पूजित नेमिनाथ तीर्थङ्करने कहा है, ऐसा भी अर्थ किया है।)
विशेषार्थ- आहारमार्गणा में चारआनुपूर्वी के बिना उदययोग्य ११८ प्रकृतियाँ हैं। गुणस्थान आदि के १३ हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ५, उदयप्रकृति ११३, अनुदयप्रकृति ५ । सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ९, उदयप्रकृति १०८ और अनुदयप्रकृति १० हैं। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १, उपमहानि १.००. और आदयाकृति १८ । असंयतगणस्थान में चार आनुपूर्वी जिना व्युच्छित्ति १३ प्रकृति की, उदय १०० प्रकृति का, अनुदय १८ प्रकृति का। देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ८, उदयप्रकृति ८७, अनुदयप्रकृति ३१ । प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ५, उदयप्रकृति ८१, अनुदयप्रकृति ३७। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ४, उदयप्रकृति ७६ और अनुदयप्रकृति ४२ हैं। अपूर्वकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६, उदयप्रकृति ७२, अनुदयप्रकृति ४६ हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६, उदयप्रकृति ६६, अनुदयप्रकृति ५२ । सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १, उदयप्रकृति ६० और अनुदयप्रकृति ५८ हैं। उपशान्तमोहगुणस्थान में व्युच्छित्ति २ प्रकृति की, उदय ५९ प्रकृति का, अनुदय ५९ प्रकृति का। क्षीणमोहगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १६, उदयप्रकृति ५७, अनुदयप्रकृति ६१। सयोगीगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ४२, उदयप्रकृति ४२ और अनुदयप्रकृति ७६ जानना।
आहारमार्गणा में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि
उदययोग्यप्रकृति ११८, गुणस्थान १३
उदयव्युच्छित्ति | उदय
| अनुदय
गुणस्थान मिथ्यात्व
सासादन
मिश्र
विशेष | अनु. ५ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकद्विक,
तीर्थकर) व्यु, ५ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) ९ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) १८(१०+९-१९-१ सम्यग्मिथ्यात्व) १८(१८+१=१९-१ सम्यक्त्व) १३ (गुणस्थानोक्त १७-४ गत्यानुपूर्वी) ८ (गाथा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार) ३७ (३१+८=३९-२ आहारकद्विक) ५ (गाथा २६३ की सन्दृष्टि अनुसार)
असंयत
देशसंयत
प्रमत्त