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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९४ मिश्र असंयत देशसंयत प्रमत्त अप्रमत्त अपूर्वकरण । ६ अनिवृत्तिकरण ६ सूक्ष्मसाम्पराय| १ उपशान्तमोह २ क्षीणपोह सयोगकेवली | ४२ | ११(७+४+१ देवगत्यानुपूर्वी-१सम्यग्मिथ्यात्व) | ९ (११+१=१२-३ सम्यक्त्व, देव| मनुष्यगत्यानुपूर्वी) | ८ गुणस्थानोक्त गाथा२६३ की सन्दृष्टि अनुसार) २८(२२+८=३०-२ आहारकद्विक) ५ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) | ४ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) ६ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) ६ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) १ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) | २ (गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) १६(गुणस्थानोक्त गाथा २६३ के अनुसार) ६७(५२+१६-६८-१ तीर्थंकर) "इति लेश्यामार्गणा" अथ भव्य-सम्यक्त्वमार्गणा भव्विदरुवसमवेदगखइये सगुणोघमुवसमे खइये। ण हि सम्ममुवसमे पुण णादितियाणू य हारदुर्ग ।।३२८॥ खाइयसम्मो देसो णर एव जदो तहिं ण तिरियाऊ । उजोवं तिरियगदी तेसिं अयदम्हि वोच्छेदो ॥३२९॥ अर्थ- भव्य-अभव्य, उपशमसम्यक्त्व, वेदकसम्यक्त्व और क्षायिकसम्यक्त्व मार्गणा में अपने-अपने गुणस्थानवत् कथन जानना, किन्तु विशेषता यह है कि उपशम व क्षायिकसम्यक्त्व में सम्यक्त्वप्रकृति का उदय नहीं है तथा उपशमसम्यक्त्व में तीन (नरक तिर्यञ्च-मनुष्य) गत्यानुपूर्वी और आहारकद्विक ये पाँच प्रकृति उदययोग्य नहीं हैं और देशसंयतगुणस्थानवर्ती क्षायिकसम्यग्दृष्टि मनुष्य ही होता है (क्योंकि क्षायिकसम्यग्दृष्टि भोगभूमिज तिर्यञ्चों में उत्पन्न होता है वहाँ पर देशसंयम नहीं है) इसलिए देशसंयतगुणस्थान में तिर्यञ्चायु-उद्योत और तिर्यञ्चगति इन तीनों का उदय नहीं है। इस कारण
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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