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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९३ प्रमत्त २७ । २७(२१+८-२९-२ आहारक द्विक) ५ (गाथा २६४ के अनुसार) | ७६ । ३२ । ४ (गुणस्थानोक्त,गाथा २६४ की सन्दृष्टिअनुसार) अप्रमत्त शुक्ललेश्या में उदययोग्यप्रकृति १०९ हैं, गुणस्थान मिथ्यात्व से सयोगीपर्यन्त १३ हैं। मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति एक मिथ्यात्वतकति की, उदयप्रकृति १०.३. अनदय सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकद्विक, तीर्थङ्कर, मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन ६ प्रकृति का है। सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्ति अनन्तानुबन्धीकषाय ४, उदयप्रकृति पीत, पद्मलेश्यावत् १०२। अनुदय पीत, पद्मलेश्या की अपेक्षा यहाँ तीर्थङ्करप्रकृति सर्वत्र अनुदयरूप होने से अनुदयप्रकृति अप्रमत्तगुणस्थानपर्यन्त एक-एक अधिक होती जाने से सासादनगुणस्थान में ७ प्रकृति का है। मिश्वगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १ सम्यग्मिथ्यात्व, उदयप्रकृति ९८, अनुदयप्रकृति ११ । असंयत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १३, उदयप्रकृति १००, अनुदयप्रकृति ९। देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ८, उदयप्रकृति ८७, अनुदयप्रकृति २२। प्रमत्तसंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ५, उदयप्रकृति ८१, अनदुयप्रकृति २८। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ४, उदयप्रकृति ७६, अनुदयप्रकृति ३३ हैं। अपूर्वकरणगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूपप्रकृति गुणस्थानोक्त ६, उदयप्रकृति ७२, अनुदयप्रकृति गुणस्थानोक्त में से १३ कम जानना । क्योंकि शुक्ललेश्या में मूल में ही उदययोग्य ५३ प्रकृतियाँ कम की हैं अत: यहाँ ३७ प्रकृति अनुदयरूप है। यह १३ प्रकृति कम का क्रम आगे के गुणस्थानों में सर्वत्र जानना। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६, उदयप्रकृति ६६, अनुदयप्रकृति ४३ । सूक्ष्मसापरायगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १, उदयप्रकृति ६०. अनुदयप्रकृति ४९ । उपशान्तमोहगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति २, उदयप्रकृति ५९, अनुदयप्रकृति ५० । क्षीणमोहगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १६, उदयप्रकृति ५७, अनुदयप्रकृति ५२ । सयोगकेवलीगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ४२, उदयप्रकृति ४२, अनुदयप्रकृति ६७ जानना।। शुक्ललेश्या में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि उदययोग्यप्रकृति १०९, गुणस्थान १३ उदयगुणस्थान व्युच्छित्ति | उदय मिथ्यात्व अनुदय विशेष 1६ (सम्यग्भिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकट्टिक, ___ मनुष्यगत्यानुपूर्वी और तीर्थंकर) | १ (मिथ्यात्व) | ४ (अनन्तानुबन्धीकषाय) सासादन १०२
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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