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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९२ प्रकृति का उदय न होने से उदययोग्य १०९ प्रकृति हैं। उसमें भी मिथ्यादृष्टिआदि दो गुणस्थानों में मनुष्यगत्यानुपूर्वी का भी उदय नहीं है। विशेषार्थ- पीत (तेजो) और पद्यलेश्या में तीर्थङ्करप्रकृतिबिना उदययोग्य १०८ प्रकृति हैं, आदि के सात गुणस्थान हैं। यहाँ पर मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति १ मिथ्यात्वप्रकृतिकी, उदयप्रकृति १०३, अनुदय सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकद्विक और "णराडू ण मिच्छदुगे" इस वचन से मनुष्यगत्यानुपूर्वी इन पाँच प्रकृति का। सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अनन्तानुबन्धी की कषाय ४, उदयप्रकृति १०२, अनुदयप्रकृति ६। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति की, उदय ९८ प्रकृति का, अनुदयप्रकृति १०/ असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अप्रत्याख्यानकषाय ४. देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअङ्गोपाङ्ग, देवायु, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति ये १३ हैं, उदयप्रकृति १०० और अनुदयप्रकृति ८ हैं। देशसंयत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति प्रत्याख्यान की कषाय ४, तिर्यञ्चायु, तिर्यञ्चगति, उद्योत, नीचगोत्र ये आठ, उदयप्रकृति ८७, अनुदयप्रकृति २१ हैं। प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति आहारकद्विक और स्त्यानगृद्धिआदि तीन, उदयप्रकृति ८१, अनुदयप्रकृति २७ । अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति सम्यक्त्व और अन्तिम तीनसंहनन, उदयप्रकृति ७६, अनुदयप्रकृति ३२ हैं। ..: : :: पीत (तेज) और पद्मलेश्या में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि ___उदययोग्यप्रकृति १०८, गुणस्थान १ से ७ तक उदय- । गुणस्थान | व्युच्छित्ति | उदय अनुदय विशेष | ५ (मिश्र, सम्यक्त्व, आहारकद्विक, मनुष्य ___ गत्यानुपूर्वी) १ (सम्यग्मिथ्यात्व) सासादन ४ (अनन्तानुबन्धीक्रोध-मान-माया) मिश्र १० (६+४+देवगत्यानुपूर्वी-सम्यग्मिथ्यात्व) १ (सम्यग्मिथ्यात्व) है।असंज्ञी के द्रव्यमन भी नहीं होता, किन्तु केवली के द्रव्यमान है। अत: वे असंज्ञी नहीं हैं। असंयत । १३ १०० ८ ८ (१०+१८११-मनुष्य-देवगत्यानुपूर्वी, सम्यवत्व) १३ (अप्रत्याख्यानकी ४ कषाय, देवद्विक, टेवायु, वैक्रिय कद्विक, मनुष्यगत्या नुपूर्वी, दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति) देशसंयत । ८ । ८७ । २१ । ८ (गुणस्थानोक्त, गाथा २६४ की सन्दृष्टि) मिथ्यात्व १००
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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