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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२९१
कापोतलेश्या में उदययोग्य ११९ प्रकृति हैं तथा गुणस्थान आदि के ४ हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति गुणस्थानोक्त ५ प्रकृति की, उदयप्रकृति ११७, अनुदयप्रकृति सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व । सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्ति गुणस्थानोक्त ९ प्रकृति तथा देवगति, देवगत्यानुपूर्वी और देवायु इन १२ प्रकृति की, उदयप्रकृति १५१, अनुदयप्रकृति ८ । मिश्रगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १ सम्यग्मिथ्यात्व, उदयप्रकृति ९८, अनुदयप्रकृति २१। असंयतगुणस्थान में अप्रत्याख्यानकषाय ४, नरकगति, नरकगत्यानुपूर्वी, नरकायु, वैक्रियिकशरीर वैक्रियिकअङ्गोपाङ्ग, तिर्यञ्च व मनुष्यगत्यानुपूर्वी, दुर्भगादि तीन इन १४ प्रकृति की व्युच्छित्ति, उदयप्रकृति १०१, अनुदयप्रकृति १८ हैं। भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषीदेवों के अपर्याप्तकाल में कृष्ण, नील और कापोतलेश्या ही है तथा पर्याप्तकाल में तेजोलेश्या का जघन्यअंश पाया जाता है। अशुभलेश्या का धारक असंयत भवनत्रिक में उत्पन्न नहीं होता अत: देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, देवायुकी उदयव्युच्छित्ति सासादनगुणस्थान में ही होती है। कापोतलेश्या में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि
उदययोग्यप्रकृति ११९, गुणस्थान ४ उदयगणस्थान | ब्युच्छित्ति | उदय । अनुदय
विशेष मिथ्यात्व
२ (सम्यग्मिध्यात्व, सम्यक्त्व)
५ (गुणस्थानोक्त) सासादन
८ (५+२+१ नरकगत्यानुपूर्वी)
१२(९ गुणस्थानोक्त, देवद्विक देवायु) मिश्र
२१(१२+८+२ मनुष्य व तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी-१
सम्यग्मिथ्यात्व) १८(२१+१-२२-४, नरकगत्यानुपूर्वी बिना तीन
आनुपूर्वी और सम्यक्त्व) १४(१२ कृष्ण व नीललेश्यासम्बन्धी सन्दृष्टिवत्
___ + नरक व तिर्यञ्चमत्यानुपूर्वो) आगे तीन शुभलेश्याओं में उदयादि का कथन करते हैं
तेउतिये सगुणोघं णादाविगिविगलथावरचउक्कं ।
णिरयदुतदाउतिरियाणुगं णराणू ण मिच्छदुगे॥३२७|| अर्थ- तेजोआदि तीन शुभलेश्याओं में अपने-अपने गुणस्थान के समान १२२ प्रकृति में से आतप, एकेन्द्रिय, विकलेन्द्रियत्रय, स्थावरादि ४, नरकद्विक, नरकायु, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी इन १३
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असयत