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________________ ... .:. :नीभन्सार कर्मकाण्ड-२९० सासादनगुणस्थान में गुणस्थानोक्त ९ तथा असंयतसम्बन्धी देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, देवायु, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी इन १३ प्रकृति की व्युच्छित्ति होती है। मिश्रगुणस्थान में सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृति की तथा असंयतगुणस्थान में अप्रत्याख्यानकषाय ४, नरकगति, नरकायु, वैक्रियिकद्विक, मनुष्यगत्यानुपूर्वी दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति ये तीन इस प्रकार १२ प्रकृति की व्युच्छित्ति होती है। यहाँ "भोग पुण्णगसम्मे काउस्स जहणियं हवे" भोगभूमिया निर्वृत्यपर्याप्तक सम्यग्दृष्टि के कापोत लेश्या का जघन्य अंश होता है। इन वचनों के अनुसार यहाँ तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी नहीं कहीं, क्योंकि असंयतदेवनारकी, तिर्यञ्चों में उत्पन्न नहीं होते हैं। नरक से आया सम्यग्दृष्टिजीव कर्मभूमि के मनुष्यों में उत्पन्न होता है, यहाँ पर अन्तर्मुहूर्तपर्यन्त पूर्वभवसम्बन्धी लेश्या रहती है अतः मनुष्यगत्यानुपूर्वी का उदय यहाँ असंयतगुणस्थान में पाया जाता है। तथा मिथ्यात्वगुणस्थान में उदयप्रकृति ११७, अनुदयप्रकृति सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व | सासादनगुणस्थान में उदयप्रकृति १११, अनुदयप्रकृति ८ । मिश्रगुणस्थान में उदयप्रकृति ९८, अनुदयप्रकृति २१ । असंयतगुणस्थान में उदयप्रकृति ९९, अनुदयप्रकृति २० हैं। कृष्ण-नील लेश्या में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि उदययोग्यप्रकृति ११९, गुणस्थान ४ उदय| व्युच्छित्ति उदय गुणस्थान मिध्यात्व सासादन अनुदय विशेष २ २ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व) | ६ (गुणस्थानोक्त ५+१ नरकगत्यानुपूर्वी) ८ । १३(४ अनन्तानुबन्धीकषाय, एकेन्द्रियादि __४ जाति, स्थावर, देवद्विक, देवायु और तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी) २१(१३+८+१ मनुष्यगत्यानुपूर्वी १ सम्यग्मिथ्यात्व) २०(२१+१=२२-सम्यक्त्व, मनुष्यगत्यानुपूर्वी) १२(अप्रत्याख्यानकषाय ४, वैक्रियिकद्विक, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, अयशस्कीर्ति, दुर्भग, अनादेय, नरकगति, नरकायु) मिश्र असंयत
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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