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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२७९ २, क्षीणकषायसम्बन्धी १६ और सयोगकेवलीसम्बन्धी तीर्थङ्करबिना शेष ४१ इसप्रकार ६३ प्रकृतियों की है। उदयप्रकृति अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के दूसरे क्रोधकषाय वाले भाग में ६३, अनुदयप्रकृति ४६
अनन्तानुबन्धी रहित क्रोध में मिथ्यादृष्टि के उदययोग्य प्रकृति ९१ हैं, क्योंकि क्रोधकषायसम्बन्धी मिथ्यात्वगुणस्थान की उदययोग्यप्रकृति १०५ में से एकेन्द्रिय, विकलत्रय, आतप, अनन्तानुबन्धीक्रोध, चारआनुपूर्वी, स्थावर,सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त इन १४ प्रकृतियोंका यहाँ उदय नहीं होने से इनको कम किया है अर्थात् अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन करके मिथ्यात्व को जो प्राप्त हुआ है उसके एकआवलीकालपर्यन्त अनन्तानुबन्धीका उदय नहीं होता है, उसके उदययोग्य ९१ प्रकृतियाँ हैं।
नोट- अनन्तानुबन्धी ४ कषाय की विसंयोजना करके मिथ्यात्व के उदय से जो प्रथमगुणस्थान में आया ऐसे जीव के अनन्तानुबन्यों का उदय ही होता है, क्योंकि इस जीव के अनन्तानुबन्धीचारकषाय सत्ता में नहीं है, किन्तु पहले गुणस्थान में आनेपर अनन्तानुबन्धीका नवीनबन्ध होने से इसका उदय बन्धावलीकाल के पश्चात् होगा। मिथ्यात्वगुणस्थान में अनन्तानुबन्धी ४ कषाय का उदय नहीं है उस समय इस जीव के, १०५ में से १४ बिना ९१. प्रकृति का उदय होता है। क्रोधकषाय में उदयव्युच्छित्ति-उदय-अनुदयसम्बन्धी सन्दृष्टि
उदययोग्यप्रकृति १०९, गुणस्थान ९
उदयगुणस्थान | व्युच्छित्ति मिथ्यात्व
उदय
अनुदय
सासादन
विशेष ४ (सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आहारकद्विक) ५ (मिथ्यात्व, आतप, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण) १०(५+४=९+१ नरकगत्यानुपूर्वी) ६ (अनन्तानुबन्धीक्रोध, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय,
त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और स्थावर) १८(१०+६=१६-१ सम्यग्मिथ्यात्व + ३
गत्यानुपूर्वी) १ (सम्यग्मिथ्यात्व) १४ (१८+१= १९- सम्यक्त्व और चार
मिश्र
असंयत गत्यानुपूर्वी)
१४व्यु. (अप्रत्याख्यानक्रोध वैक्रियकषट्क,
देव-नरकायु, मनुष्य-तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी दुर्भग, अनादेय, अयश.)