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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२८०
देशसंयत
प्रमत्त
अप्रमत्त
अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण ६३
५ (प्रत्याख्यानक्रोध, तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चायु,
उद्योत, नीचगोत्र) |३१(२८+५=३३-२ आहारकद्रिक)
५ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार) |४ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार) ६ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार) व्यु. ६३ (अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के प्रथम-भाग
की ३ वेद, द्वितीयभाग की सज्वलनक्रोध, सूक्ष्मसाम्परायकी शून्य, उपशान्तकषाय "की २, क्षीणकषाय की १६, सयोगकेवली की तीर्थंकरबिना ४१)
इसीप्रकार मान-माया-लोभकषायों में भी उदयादि का कथन जानना चाहिए, किन्तु इतना विशेष है कि सूक्ष्मलोभसम्बन्धी कथन में सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान का भी कथन होगा। यहाँ २३ गुणस्थान में तीन वेद की व्युच्छित्ति, उदयप्रकृति६३, अनुदय प्रकृति ४६। १० वें गुणस्थान में ६० की व्युच्छित्ति, ६० का उदय और ४९ अनुदय प्रकृति है।
॥ इति कषायमार्गणा ॥
अथ ज्ञानमार्गणा एवं माणादितिए, मदिसुदअण्णाणगे दु सगुणोघं ।
वेभंगेवि ण ताविगिविगलिंदी थावराणुचऊ ॥३२३॥ अर्थ - इस प्रकार मानादि तीनकषायों में जानना। (इसका कथन गाथा ३२२ में कषायमार्गणा के अन्तर्गत कर दिया है।) ज्ञानमार्गणा के अन्तर्गत कुमति और कुश्रुत ज्ञान में सामान्य से गुणस्थानोक्त १२२ प्रकृति में से आहारकदिक, तीर्थङ्कर, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व बिना शेष ११७ प्रकृतियाँ उदययोग्य हैं तथा विभङ्ग (कुअवधि) ज्ञान में भी ११७ में से आतप, एकेन्द्रिय, विकलत्रय, स्थावर, सूक्ष्म, साधारण, अपर्याप्त, आनुपूर्वी ४ इन १३ प्रकृतियों के बिना शेष १०४ प्रकृति उदययोग्य हैं।