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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२७५ प्रमत्त अप्रमत्त देशसंयत ८ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) २८ (२२+८=३०-२ आहारकद्विक) ५ (गाथा २६४ के अनुसार) ४ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) अपूर्वकरण ६ ६ (गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार) अनिवृत्तिकरण ६४ | ६४ (पुरुषवेद+अवेदभागसे सयोगीपर्यन्त सवेदभाग क्रमशः व्युच्छिन्न होने वाली ३+१+२ +१६+४१६४) अथानन्तर स्त्रीवेद और नपुंसकवेद में उदयादि का कथन करते हैं इस्थिवेदे वि तहा, हारदुपुरिसूणमिस्थिसंजुत्तं । ओघं संढे ण हि सुरहारदुथीपुंसुराउतित्थयरं ॥३२१॥ अर्थ - पुरुषवेदसम्बन्धी उदययोग्य प्रकृति १०७ में से आहारकद्विक और पुरुषवेद कम करके स्त्रीवेद मिलाने से स्त्रीवेद में उदययोग्य प्रकृति १०५ हैं तथा सामान्य से गुणस्थानोक्त १२२ प्रकृति में से देवद्विक, आहारकद्विक, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, देवायु और तीर्थङ्कर ये आठप्रकृतियाँ कम करने पर नपुंसकवेद में उदययोग्य प्रकृति ११४ हैं। विशेषार्थ - स्त्रीवेद में उदययोग्यप्रकृति १०५, गुणस्थान ९ हैं। यहाँ मिथ्यात्व गुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १ मिथ्यात्व, उदयप्रकृति १०३, अनुदयप्रकृति सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्व ये दो। सासादनगुणस्थान में अनन्तानुबन्धी कषाय ४, देव-मनुष्य व तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी इन ७ प्रकृति की व्युच्छित्ति, उदयप्रकृति १०२, अनुदयप्रकृति ३। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १ सम्यग्मिथ्यात्व, उदयप्रकृति ९६ अनुदयप्रकृति ९ । असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अप्रत्याख्यानकषाय ४, देवगति, वैक्रियिकद्विक, देवायु, दुर्भग, अनादेय और अयशस्कीर्ति ये ११ हैं। उदयप्रकृति ९६, अनुदयप्रकृति ९। देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति गुणस्थानोक्त ८, उदयप्रकृति ८५ और अनुदयप्रकृति २० । प्रमत्तसंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति स्त्यानगृद्धिआदि तीननिद्रा, क्योंकि स्त्रीवेदी संक्लेशी हैं अत: उनके आहारकद्विक नहीं हैं। उदयप्रकृति ७७, अनुदयप्रकृति २८। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति, सम्यक्त्व एवं अंतिमतीन संहनन ये ४ हैं, उदयप्रकृति ७४ तथा अनुदय ३१ प्रकृति का है। अपूर्वकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति ६ हास्यादि नोकषाय, उदयप्रकृति ७०, अनुदयप्रकृति ३५ हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के सवेदभाग में व्युच्छिन्नप्रकृति पूर्वोक्त ६४, उदयप्रकृति ६४ और अनुदयप्रकृति
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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