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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२३७
भावार्थ - उदीरणा का अर्थ है अपक्वपाचन अर्थात् दीर्घकाल में उदय में आने वाले कर्मपरमाणुओं में से अग्रिम निषेकों का अपकर्षण करके अल्पस्थितिवाले नीचे के निषेकों में देकर उदयावली में लाकर उदय रूप से उनको भोग कर, कर्मरूप से छुड़ा कर अन्य पुद्गल रूप से परिणमाना ।
तीसं बारस उदयुच्छेदं केवलिणमेकदं किच्चा।
सादमसादं च तहिं, मणुवाउगमवणिदं किच्चा ॥२७९॥ अर्थ- सयोग-अयोगकेवलीगुणस्थान की ३० और १२ प्रकृति मिलकर ४२ प्रकृतियों में से साता-असाता और मनुष्याय इन तीन प्रकृतियों को घटाना चाहिए।
अवणिद तिप्पयडीणं, पमत्तविरदे उदीरणा होदि।
णस्थिति अजोगिजिणे, उदीरणा उदयपयडीणं ॥२८०॥ अर्थ - घटाई हुई साता आदि तीन प्रकृतियों की उदीरणा से व्युच्छित्ति प्रमत्त गुणस्थान में हो जाती है अतः यहाँ आठ प्रकृतियों की उदीरणा व्युच्छित्ति होती है। शेष ३९ प्रकृतियों की उदीरणा तथा उदीरणाव्युच्छित्ति सयोगकेवली के ही होती है। अयोगकेवली के उदय प्रकृतियों की उदीरणा नहीं पाई जाती, यही यहाँ विशेषता है। अब उदीरणा से व्युच्छिन्न प्रकृतियों का कथन गुणस्थानों में करते हैं
पण णव इगि सत्तरसं, अट्ठट्ठ य चदुर छक्क छच्चेव ।
इगि दुग सोलुगदालं, उदीरणा होति जोगंता ।।२८१॥ __ अर्थ - मिथ्यात्व से सयोगकेवलीगुणस्थानपर्यन्त क्रम से ५-९-१-१७-८-८-४-६-६-१२-१६ और ३९ प्रकृतियों की उदीरणाव्युच्छित्ति होती है। अथानन्तर दो गाथाओं से उदीरणा-अनुदीरणारूप प्रकृतियों को कहते हैं
सत्तरसेक्कारखचदुसहियसयं सगिगिसीदि तियसदरी। णवतिण्णिसट्टि सगछक्कवण्ण चउवण्णमुगुदालं ॥२८२।। पंचेक्कारसबावीसट्ठारस पंचतीस इगिणवदालं ।
तेवण्णेक्कुणसट्टी, पणछक्कडसट्टि तेसीदी ॥२८३।। अर्थ- मिथ्यात्वादि १३ गुणस्थानों में क्रम से ११७-१११-१००-१०४-८७-८१-७३-६९६३-५७-५६-५४-३९ प्रकृतियाँ उदीरणारूप हैं तथा ५-११-२२-१८-३५-४१-४९-५३-५९-६५६६-६८ और ८३ प्रकृतियाँ अनुदीरणारूप हैं। इनका विशेष कथन निम्नसन्दृष्टि से जानना चाहिए।