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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२३८ गुणस्थानों उदीरणाव्युच्छित्ति-उदीरणा और अनुदीरणारूप प्रकृतियों की सन्दृष्टि
मिश्र
उदीरणा गुणस्थान व्युच्छित्ति | उदीरणा | अनुदीरणा
विशेष मिथ्यात्व
गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार सासादन १११
गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार
२२ गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार असंयत
१०४ १८ गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार देशसयत
८७
गाथा २६४ की सन्दृष्टि के अनुसार प्रमत्त
| ८ (उदयव्युच्छित्ति में कथित ५ प्रकृति तथा
साता व असातावेदनीय और मनुष्यायु) अप्रमत्त
यहाँ उदय में ७६ प्रकृति कही है, किन्तु सातादि | तीन प्रकृतियों की उदीरणा छठे गुण- स्थान में ही हो जाने से यहाँ अनुदीरणा में ३ प्रकृति बढ़ गई ।
अतः उदीरणारूप ७३ प्रकृतियाँ ही रहीं। अपूर्वकरण । ६
गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार अनिवृत्तिकरण ६
गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार सूक्ष्मसाम्पसय
गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार उपशान्तमोह | २
गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार क्षीणमोह
| गाथा २६४ की सन्दृष्टि अनुसार ८३ (६८+१६-१ तीर्थकर)
सयोग
गुणस्थानों में उदय-उदीरणारूप त्रिभङ्गीका कथन करके गतिआदि १४ मार्गणाओं में उदयत्रिभङ्गीका कथन करते हुए प्रथम ही उदय का कथन करते हैं
गदियादिसु जोग्गाणं, पयडिप्पहुदीणमोघसिद्धाणं ।
सामित्तं णेदव्वं, कमसो उदयं समासेज्ज ।।२८४॥ अर्थ - प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेशबन्ध गुणस्थानों में सिद्ध किए जा चुके हैं। उदयापेक्षा उनका स्वामित्व, गतिआदि मार्गणाओं में क्रम से घटित करना चाहिए। आगे इस विषय में सर्वप्रथम कुछ विशेष बातें पाँच गाथाओं से कहते हैं
गदिआणुआउउदओ, सपदे भूपुण्णबादरे ताओ। उच्चुदओ णरदेवे, थीणतिगुदओ णरे तिरिये ॥२८५||