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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२२६
है शेष निषेक आगामी काल में उदय होते हैं। अन्त में समयप्रबद्ध का बन्ध होने से अब आबाधाकाल
और ४७ समय होगए तथा ४७ निषेक जिसके पहले खिर गए हैं उसका ९ रूप अन्तिमनिषक वर्तमान काल में यल्प होलापकोई निक नहीं रहा अत: पहले जो समयप्रबद्ध बंधे थे उनके सर्वनिषेक निर्जीर्ण हो गए इसलिए उनका कुछ प्रयोजन ही नहीं ।
इस प्रकार वर्तमानविवक्षित एक समय में ५१२ से ९ पर्यन्त सर्वनिषेक एकसमय में उदय होते. हैं उनका जोड़ देने पर सम्पूर्ण समयप्रबद्ध का उदय कहा है। ऐसे एक-एक समय प्रबद्धप्रमाण परमाणु खिरते हैं वहीं एक समयप्रबद्ध प्रमाण परमाणु नवीन बँधते हैं तथा किंचित्ऊन डेढ़गुणहानि से गुणित प्रमाण समयप्रबद्ध सत्ता में रहते हैं। अङ्कसन्दृष्टिवत् अर्थसन्दृष्टि का कथन है अतः अनुभागबन्धाध्यवसायस्थानों से कर्मपरमाणु अनन्तगुणे कहे हैं, क्योंकि एकसमय प्रबद्ध में, अभव्यों से अनन्तगुणे और सिद्धों के अनन्तवेंभागप्रमाण अनन्तकर्मपरमाणु होते हैं।
"इति प्रदेशबन्धप्रकरण' ॥ इसप्रकार बन्धोदयसत्त्वाधिकार में बन्धप्रकरण पूर्ण हुआ ॥
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अथ उदयप्रकरण चार प्रकार के बन्ध का निरूपण करने के अनन्तर अब गुणस्थानों में उदय का नियम कहते हैं
आहारं तु पमत्ते, तित्थं केवलिणि मिस्सयं मिस्से ।
सम्मं वेदगसम्मे, मिच्छदुगयदेव आणुदओ॥२६१।। अर्थ- आहारकशरीर और आहारकअनोपान का उदय प्रमत्तगुणस्थान में ही होता है, । तीर्थङ्करप्रकृतिका उदय सयोगी और अयोगकेवली के ही है। मिश्रमोहनीय का उदय सम्यग्मिथ्यात्वगुणस्थान में ही है। सम्यक्त्वप्रकृति का उदय असंयतादि चारगुणस्थानवर्ती वेदकसम्यग्दृष्टि के ही है, आनुपूर्वी का उदय मिथ्यादृष्टि, सासादन और असंयतगुणस्थान में ही है, अन्यत्र उनके उदय का अभाव है।
आनुपूर्षीकर्म के उदयसम्बन्धी कुछ विशेषता कहते हैंणिरयं सासणसम्मो, ण गच्छदित्ति य ण तस्स णिरयाणू। मिच्छादिसु सेसुदओ, सगसगचरमोत्ति णादवो ॥२६२॥