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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-२०३ उपरितन स्थिति अधस्तन स्थिति ਧਰ १२८ MAM त्रस जीवों के योगस्थानों में जीव यवमध्य ७६ ३५२ नोट - अङ्कसन्दृष्टिकी अपेक्षा योगस्थानों में कुल जीवों की संख्या १४२२ है। इसमें से ६१६ जीव तो यवमध्यगुणहानि के नीचे हैं और ३९० जीव यवमध्यगुणहानि के अर हैं और ४१६ यवमध्यगुणहानि में हैं। पुण्णतसजोगठाणं, छेदाऽसंखस्सऽसंखबहुभागे। दलमिगिभागं च दलं, दव्वदुगं उभयदलवारा ॥२४७।। अर्थ : द्रव्य और स्थिति का प्रमाण क्रम से पर्याप्तत्रसजीवराशि के प्रमाण तथा पर्याप्तत्रसम्बन्धी परिणामयोगस्थानों के प्रमाण जानना और पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग प्रमाण नानागुणहानियों में असंख्यात का भाग देने से असंख्यातबहुभाग का जो प्रमाण हो उसका आधा तो नीचे की गुणहानिका और शेष का आधा तथा शेष बचा हुआ असंख्यातवां एकभाग मिलकर ऊपर की नानागुणहानि का प्रमाण होता है इस प्रकार दोनों नानागुणहानियों का प्रमाण समझना। विशेषार्थ : जैसे द्रव्य का प्रमाण १४२२ कहा वैसे संख्यात का भाग प्रतरागुल में देने पर जो लब्ध आवे उसका जगत्प्रतर में भाग देने से जो लब्ध आवे उतने प्रमाण पर्याप्तत्रसजीव हैं तथा जिसप्रकार योगस्थानअध्वान ३२ कहा वैसे ही द्वीन्द्रियपर्याप्तक के जघन्यपरिणामयोग से सङ्घीपर्याप्तकके उत्कृष्टपरिणामयोगपर्यन्त जितने योगस्थान हों उतना योगस्थान का अध्वान जानना, वे स्थान ८४ कहे वहाँ द्वीन्द्रियपर्याप्त के जघन्यपरिणामयोगस्थान का प्रमाण जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग को ७५ बार पल्य के असंख्यातवें भाग से गुणा करने पर जो प्रमाण होता है उसको अपवर्तन करने पर जगत्श्रेणी के असंख्यातवें भाग मात्र ही हुआ तथा इसमें सूच्यफुलके असंख्यातवें भाग मात्र मिलने पर अनन्तरस्थान हुआ उसको आदि लेकर सङ्घीपर्याप्त का उत्कृष्टयोगस्थान अङ्कसन्दृष्टि की अपेक्षा जघन्य से ३२ गुणा तथा यथार्थ की अपेक्षा पल्य के अर्धच्छेदों के असंख्यातवें भाग गुणे हैं सो यहाँ पर्यन्त स्थानों का प्रमाण कहते हैं - १. धवल पु. १० पृ. ७६। २. "पदरंगुलस्स संखेजदिभागेणजगपदरे भागे हिदे सच जोगट्ठाणाणं तसपज्जत्तजीवपमाणं होदि।" (धवल पु. १० पृ. ६१)
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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