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* विषयानुक्रम *
गाथा सं. | पृष्ठ सं.
विषय
ॐ १. प्रकृतिसमुत्कीर्तनाधिकार के
मंगलाचरण
प्रकृतिका अर्थ, कर्म व आत्माका अनादिसम्बन्ध इतरेतराश्रयदोषका निराकरण व जोय कथंचित् मूर्तिक है. देह उदयसे सहित होनेके कारण जीव सर्वांगसे काँको ग्रहण करता है सिद्धोंके अनन्तवें भागप्रमाण स्वरूप समयबद्ध प्रतिसमय बंधता है प्रतिसमय एक समयप्रनद्ध उदय आकर निजीण हो जाता है और इन्दगुणहानि गुणित समयप्रबद्धप्रमाण द्रज्य सत्ताने रहता है द्रव्यकर्म व भाकर द्रव्यकर्मके भेद-प्रभेद संख्या
आठकर्मोंक नाम तथा उनमें घातिया व अघातिया भेट तथा आठों कर्मोंका कार्य जीवके प्रधानगुण दर्शन, ज्ञान व सम्यक्त्व हैं आठाकोंके पाठक्रमकी सिद्धि दृष्टान्त द्वारा कोक स्वभावका कथन ज्ञानावरणादि आठकर्मोके उत्तरभेदोंको संख्या ज्ञानावरण व दर्शनावरणकर्मोके उत्तरभेदोंके नाम स्त्यानगृद्धि आदि पाँच निद्राओं के कार्य वेदनीय ब मोहनीयकर्मोके उत्तरभेदोंके नाम प्रथमोपशमसम्यक्त्वसे मिथ्यात्वक्रमके तीन भेद हो जाते हैं, उसमें मिथ्यात्विक द्रव्यसे असंख्यातगुणाहीन सम्यमिथ्यात्वका द्रव्य उससे असंख्यातगुणाहीन सम्यक्त्वका द्रव्य
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चारित्रमोहनीय, आयु और नामकर्मोंके उत्तर भेदोंके नाम तथा १६ कषायोंमें हीनाधिकद्रव्यका कथन पाँच शरीर-बन्धन नामकर्मके १५ भंग शरीरसंघात, संस्थान व अंगोपांगनामकर्मके भेद