SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 25
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथा सं. | पृष्ठ सं. विषय २८ His ... RRER आठ अंगोंके नाम तथा उपांगोंका निर्देश. छहसंहननोंके नाम किस-किस संहननवाला जीव मरकर कहाँ-कहाँ उत्पन्न हो सकता है कर्मभूमि महिलाओंके तीन हीनसंहनन वर्णचतुष्क, आनुपूर्ती, अरुलघुषट्कके भेदोंका तथा १० सप्रतिपक्षी-प्रकृतियोंके नाम। आतप व उद्योत मामकर्मका लक्ष गोत्र व अन्तरायक्रमसम्बन्धी उत्तरभेदोंके नाम उत्तरप्रकृतियोंका निरुक्ति लक्षण : म केवलज्ञानावरणकी सिद्धि स्थिरनामकर्म तथा सप्तधातुक नाम व उनके बनने का क्रम और काल एवं वात-पित्तादि सप्तधातुके नाम व परिणमन पाँचबन्धन व पाँच संघातका शरीरनामकर्ममें व वार्णादिबीसका वर्णादिचार में जन्टर्भाव बन्ध, उदय व सत्त्वरूप प्रकृतियोंकी संख्या सत्रघाति व देशघाति प्रकृतियों के नाम पुण्य व पाच प्रकृतियोंके नाम व संख्या अनन्तानुबन्धीकषाय सम्यग्दर्शनको घातती है तथा अन्य तीनकषाय यथाक्रम चरित्र को घातती हैं। । २८ ३४ ३५-३८ ३९-४० ३० ४१-४४ ३१-३२ ३३ ४६ ३३ कपायोंका वासनाकाल ४७-५१ ५२-६८ ६९-८५ ३३-३५ ३५-४१ पुद्गलविणकी व भवविपाकी प्रकृतियोंके नाम नामादि चारनिक्षेपोंका कथन | मूल व उत्तरप्रकृतिक उटयके नाकन नोआगमभाव कर्म २. बन्धोदयसत्त्वाधिकार है मंगलाचरण स्तत्र, स्तुति, धर्मकथा (वस्तु) का लक्षण
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy