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जैन सिद्धान्तमें ही पौद्गलिककर्मबन्ध व आत्मपरिणामोंके परस्पर सम्बन्धका कथन है। इतनी बात अवश्य है कि जैसा कर्मोदय होगा वैसा ही आत्मपरिणाम होगा उसमें हीनाधिकता नहीं हो सकती, किन्तु आत्माके एक ही परिणाम (स्थितिबंध अध्यवसाय) से मतिज्ञानावरणके अन्तिम निषेककी स्थिति ३० कोड़ाकोड़ीसागर प्रमाणकी होती है तो प्रथम निषेककी स्थिति एकसमय अधिक तीनहजारवर्ष प्रमाण होती है। उसी आत्मपरिणामसे श्रुतज्ञानावरणादिके अन्तिमनिषेककी स्थिति पल्योपमके असंख्यातवेंभागसे हीन ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपमप्रमाण हो सकती है। (महाबन्ध पु. ३ पृ. १) इसीप्रकार आत्मा के एक ही परिणामसे मतिज्ञानावरण के अन्तिमस्पर्धकमें जो अनुभागबन्ध होता है उसका अनन्तवाँ-भागरूप अनुभाग प्रथमस्पर्धकमें होता है। जिस परिणामसे मतिज्ञानावरणका उत्कृष्ट अनुभागबन्ध होता है उसी आत्मपरिणामसे मतिज्ञानावरणके साथ बँधनेवाले श्रुतज्ञानावरणादिका अनुत्कृष्ट अनुभागबन्ध अनन्तगुणाहीन तक हो सकता है। (महाबन्ध पु. ५ पृ. १) आत्मपरिणाम-कषायरूपपरिणामके अनुरूप ही स्थितिबन्ध व अनुभागबन्ध होता है, ऐसा नियम नहीं है, किन्तु कर्मअनुभागोदयके अनुरूप ही आत्माके परिणाम होते हैं; ऐसा नियम है, क्योंकि 'चिपाकोऽनुभव:' इसप्रकार सूत्रवचन हैं। जो कर्मोदयके अनुरूप आत्मपरिणाम नहीं मानते उनको ईश्वरकर्तृत्व मानना पड़ा, क्योंकि कोई भी जीव स्वतंत्ररूप से नरक में नहीं जाता नरकायु आदि कर्मोदय ही उसको नरकमें ले जाते हैं। कहा भी है-"नरकायु के बन्धबिना मिथ्यादर्शन-अविरति-कषायभावों की नरक में उत्पन्न कराने की सामर्थ्य नहीं है। (ध. पु. १ सूत्र २५ की टीका, पृ. २०५)
प्रत्येक मनुष्य कर्म और कर्मफलका चिन्तन करता है, क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति यह देखना व जानना चाहता है कि वह जो कुछ करता या विचारता है उसका क्या फल होता है। इसीलिए वह यह भी निर्णय । करता है कि किस फलकी प्राप्तिके लिए उसके कैसे विचार व कार्य होने चाहिए। अतः संस्कृति का समस्त . ऐतिहासिक, सामाजिक व धार्मिक चिन्तन कर्म और कर्मफलको अपना विषय बनाता है। इसी बातका विस्तृत विवेचन प्रस्तुत ग्रन्थमें किया गया है।
अक्षयतृतीया वि.सं. २०३७
रतनचन्द जैन मुख्तार
सहारनपुर (उ. प्र.)
* संकेतसूची.*
धवल
अ. अध्याय गो, क. गोम्मटसारकर्मकाण्ड क.प्र. कर्मप्रकृति
(भारतीय ज्ञानपीठ) ज.ध. जयधवल
(दि. जैन संघ चौरासी, मथुरा)
पुस्तक प्रा.पं.सं. प्राकृतपंचसंग्रह
(भारतीय ज्ञानपीठ
म.बन्ध महाबन्ध
(भारतीय ज्ञानपीठ) रा.वा. तन्वार्थराजवार्तिक
(भारतीय ज्ञानपीठ) स.सि. सर्वार्थसिद्धि
(भारतीय ज्ञानपीठ त्रि.सा. त्रिलोकसार