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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१९८ आठ समय तक होते हैं उन्हें मध्य में लिखें। जो योगस्थान निरन्तर सात समय तक होते हैं उनको आठ समय वालों के ऊपर और नीचे लिखें। जो योगस्थान निरन्तर छह समय तक होते हैं उनको सात समय वालों के नीचे और ऊपर लिखें। जो योगस्थान निरन्तर गज गषण तक होते हैं, जो छह समयवालों के नीचे और ऊपर लिखें। जो योगस्थान निरन्तर चार समय तक होते हैं उनको पाँच समयवालों के ऊपर और नीचे लिखें। जो योगस्थान निरन्तर तीन और दो समय तक होते हैं वे सब क्रमश: चार और तीन समय वालों के ऊपर लिखें। जैसे यव (जौ) मध्य में मोटा और ऊपर नीचे की ओर पतला होता है, उसी प्रकार मध्य में आठ समयवाले लिखें और ऊपर नीचे एक-एक कम समय वाले लिखें। ऐसी यवाकार रचना होती है। जिन योगस्थानोंमें जीव एकसमयको आदि लेकर उत्कर्षसे चारसमय परिणमते हैं वे चतुः सामयिक अर्थात् चारसमय रहनेवाले योगस्थान कहे जाते हैं। उनका प्रमाण श्रेणीके असंख्यातवेंभागमात्र है। इसीप्रकार पञ्चसामयिक, षट्सामयिक, सप्तसामयिक, अष्टसामयिक जानना तथापि यवमध्यसे ऊपर के सप्तसामयिक, षट्सामयिक, पञ्चसामयिक, चतुःसामयिक तथा उपरिमत्रिसामयिक व द्विसामयिक योगस्थान श्रेणी के असंख्यातवेंभागमात्र हैं।' __ अल्पबहुत्वके अनुसार आठसमय योग्य योगस्थान सबसे स्तोक हैं अर्थात् आगे कहे जाने वाले योगस्थानोंसे स्तोक हैं। दोनों ही पार्श्वभागोंमें सातसमय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं, दोनों ही पार्श्वभागों में छह समय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातअसंख्यातगुणे हैं, दोनों ही पार्श्वभागों में पाँचसमय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं,दोनों ही पार्श्वभागों में चारसमय योग्य योगस्थान दोनों ही तुल्य व उनसे असंख्यातगुणे हैं,उनसे तीनसमय योग्य उपरिमयोगस्थान असंख्यातगुणे हैं तथा उनसे भी दो समय योग्य योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। यहाँ गुणकार पन्योपमके असंख्यातवेंभाग है । इसका विशेष स्पष्टीकरण यवाकार रचना से होता है जो निम्नलिखित है आठसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान स्तोक हैं। दोनों पार्श्वभागों में स्थित सातसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। दोनों पार्श्वभागों में स्थित छहसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। दोनों पार्श्वभागों में स्थित पाँचसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। दोनों पार्श्वभागों में स्थित चारसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। उपरितन तीनसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। उपरितन दोसमय प्रायोग्यशक्तिवाले योगस्थान असंख्यातगुणे हैं। १. धवल पु.१० पृ. ४९४-४९५ २. धवल पु. १० पृ. ५०३-५०४
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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