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गोम्मटसारकर्मकाण्ड - १४९
वह भी उदयरूप ही है। जहाँ जितने कर्मों का बन्ध हो वहाँ समयप्रबद्ध में उतने ही कर्मका बँटवारा जानना' ।
आगे वेदनीयकर्म का अधिक भाग होने में कारण बताते हैं.
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सुहदुक्ख निमित्तादो बहुणिज्जरगोत्ति वेयणीयस्स । सव्वेहिंतो बहुगं दव्वं होदित्ति गिट्टिं ।।१९३ ||
अर्थ - वेदनीयकर्म संसारी जीवों को सुख-दुःख का कारण है, अतः इसकी निर्जरा अधिक होती है। इसीकारण अन्य मूलकर्मों से अधिकभागरूप वेदनीयक को मिलता है, ऐ जिरो - ने कहा है ।
आगे अन्यकर्मों में द्रव्य हीनाधिक विभागका कारण कहते हैं
सेसाणं पयडीणं ठिदिपडिभागेण होदि दव्वं तु ।
आवलि असंखभागो पडिभागो होदि णियमेण ॥ १९४ ॥
अर्थ- वेदनीयकर्म के बिना सर्वमूलप्रकृतियों के द्रव्य का स्थितिके अनुसार विभाग होता है, जिनकी स्थिति अधिक है उनको अधिक तथा जिनकी स्थिति कम है उनको कम हिस्सा मिलता है। मानस्थितिवाले कर्म में समानरूपसे द्रव्य का बँटवारा होता है तथा इसके विभाग करने में प्रतिभागहार नियम से आवली के असंख्यातवेंभाग प्रमाण समझना चाहिए।
विशेषार्थ - यहाँ अधिक कितना है? ऐसा प्रमाण लाने के लिए प्रतिभागहार आवलीका असंख्यातवाँभाग नियम से जानना । इसकी सन्दृष्टि ए का अङ्क है, इस प्रकार प्रतिभागहार का भाग देने पर जो एकभाग का प्रमाण हो उसे एक भाग जानना। इस एकभाग के प्रमाणबिना शेष सर्वभागों का प्रमाण बहुभाग जानना तथा जिस कर्म का जितनाद्रव्य कहा उतनेप्रमाण उस कर्म के परमाणुओं का प्रमाण है।
१. ज्ञानावरणीयके योग्य जो द्रव्य हैं वे ही मिथ्यात्वादि प्रत्ययों के कारण पाँचज्ञानावरणीयरूप से परिणमन करते हैं, अन्यरूप से वे परिणमन नहीं करते, क्योंकि वे अन्य के अयोग्य होते हैं। इसी प्रकार सर्वकर्मों के विषय में कहना चाहिए। शंका- यदि ऐसा है तो कार्मणवर्गणाएँ आठ हैं ऐसा कथन क्यों नहीं किया है? समाधान अन्तरका अभाव होने से उस प्रकार का उपदेश नहीं पाया जाता। आठ ही वर्गणाएँ पृथक् पृथक् नहीं हैं, किन्तु मिश्रित होकर रहती हैं। "आउगभागो थोवो णामागोदे समो तदो अहिओ" इसीसे जाना जाता है कि आठों ही वर्गणाएँ मिश्रित होकर रहती हैं। (धवल पु. १४ / पृ. ५५३-५५४)