________________
गोम्मटसारकर्मकाण्ड-१४७
आगे पूर्वोक्तभेदों में सादिद्रव्य का प्रमाण पाते हैं ... . .. ... ... ... .. .....
सगसगखेत्तगयस्स य अणंतिम जोग्गदव्वगयसादी ।
सेसं अजोग्गसंगयसादी होदित्ति णिद्दिढें ॥१८९ ।। अर्थ - अपने-अपने एक तथा अनेक क्षेत्र में रहने वाले पुद्गलद्रव्य के अनन्तवें भाग योग्य सादिद्रव्य है और शेष अनन्तबहुभाग अयोग्य सादिद्रव्य है, ऐसा जिनेन्द्रदेव ने कहा ।
विशेषार्थ - सर्वलोक के प्रदेशों में सर्वजीवसम्बन्धी सादिद्रव्य पूर्वोक्त प्रमाण पाया जाता है तो एकजीव की अवगाहनारूप घनाङ्गुलके असंख्यातवेंभाग प्रमाण एक क्षेत्र में कितनाद्रव्य पाया जावेगा अथवा एकक्षेत्र के प्रमाण से हीन लोकप्रमाण अनेकक्षेत्र में कितना द्रव्य होगा? इस प्रकार दो त्रैराशिक करना । यहाँ प्रमाणराशि सर्वलोक, फलराशि सादिद्रव्य का प्रमाण, इच्छाराशि एकक्षेत्र । फलराशि से इच्छाराशि को गुणा करके प्रमाणराशि का भाग देने पर जो लब्ध आया उतने प्रमाण एकक्षेत्रसम्बन्धी सादिद्रव्य का प्रमाण है।
प्रमाण राशि सर्वलोक, फलराशि सादिद्रव्य का प्रमाण, इच्छाराशि अनेकक्षेत्र। फलराशि से इच्छाराशि को गुणाकरके प्रमाणराशि का भाग देने पर जो लब्धराशि आयी उतने प्रमाण अनेकक्षेत्रसम्बन्धी सादिद्रव्य का प्रमाण जानना। एकक्षेत्रसम्बन्धी सादि द्रव्य में अनन्तका भाग देने पर एक भाग प्रमाण एक क्षेत्र सम्बन्धी कर्मरूप होने योग्य सादिद्रव्य है तथा अवशेष भाग प्रमाण एकक्षेत्रसम्बन्धी अयोग्यसादिद्रव्य जानना। इसीप्रकार अनेकक्षेत्रसम्बन्धी सादिद्रव्य को अनन्तका भाग देना उनमें एकभागप्रमाण अनेक क्षेत्रस्थित योग्यसादिद्रव्य तथा शेषभागप्रमाण अनेकक्षेत्र अयोग्यसादिद्रव्य जानना । अथानन्तर अनादिद्रध्य का प्रमाण कहते हैं -
सगसगसादिविहीणे जोग्गाजोग्गे होदि णियमेण |
जोग्गाजोग्गाणं पुण अणादिदव्वाण परिमाणं ॥१९० ॥ अर्थ - एकक्षेत्र में स्थित योग्य व अयोग्यद्रव्य तथा अनेकक्षेत्र में स्थित योग्य व अयोग्यद्रव्यका जो परिमाण है उसमें से अपने-अपने सादिद्रव्य का प्रमाण घटाने से जो शेष रहे वह क्रम से एकक्षेत्रस्थित योग्य अनादिद्रव्य, अनेकक्षेत्र स्थित अयोग्य अनादिद्रव्य, अनेकक्षेत्रस्थित योग्य अनादिद्रव्य और एक क्षेत्र स्थित योग्य अनादिद्रव्यका परिणाम जानना।
विशेषार्थ - गाथाकथित चार भेदों में से योग्य सादिद्रव्य, योग्य अनादि व योग्य उभयद्रव्य से एक समय में समयप्रबद्ध प्रमाण मूलप्रकृति व उत्तरप्रकृति और उत्तरोत्तर प्रकृतिरूप प्रदेशबन्ध प्रतिसमय होता है।