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________________ गोम्मटसारकर्मकाण्ड-१४६ तो कर्मरूप परिणमने योग्य पुद्गलद्रव्य का प्रमाण है और शेष बहुभाग प्रमाण कर्मरूप होने के अयोग्य पुद्गलद्रव्य है। अनेकक्षेत्रसम्बन्धी पुद्गलप्रमाण को अनन्तका भाग देने पर जो लब्ध आया उसमें से एकभाग प्रमाण कर्मरूप होने योग्य पुद्गलों का प्रमाण है अवशेष बहुभाग कर्मरूप होने के अयोग्य पुद्गलों का प्रमाण है। इनमें अतीत काल में जीवके द्वारा ग्रहण किया हो वह सादिद्रव्य तथा अनादिकाल से जीवने जिसको कभी भी ग्रहण नहीं किया ऐसे पुद्गलद्रव्यको अनादिद्रव्य कहते हैं। अब सादि-अनादिका प्रमाण कहते हैं - जेट समधनबद्ध अदिकाले हदेण सव्वेण। जीवेण हदे सव्वं सादि होदित्ति णिद्दिढ ॥१८८ ॥ अर्थ - उत्कृष्टसमयप्रबद्ध के प्रमाण को अतीतत्कालीन समयों से गुणा करने पर जो प्रमाण हो उसे सर्वजीवराशिके प्रमाण से गुणा करे जो प्रमाण प्राप्त होवे वह सब जीवों के सादिद्रव्य का अर्थात् सर्वसादि द्रव्य का प्रमाण है। विशेषार्थ - एक समय में उत्कृष्टतमयप्रबद्धप्रमाण पुद्गलद्रव्य को ग्रहण करे तो 'संख्यातावली » सिद्धराशि = अतीत काल के समयों का प्रमाण) अतीतकाल के समयों में कितने पुद्गलद्रव्य को ग्रहण करेगा? इस प्रकार त्रैराशिक करना। प्रमाणराशि एक समय, फलराशि उत्कृष्टसमयप्रबद्ध, इच्छाराशि अतीतकाल के समयों का प्रमाण जो कि सिद्धराशि से असंख्यातगुणा (एक आवली असंख्यात समयों की होने से) है। फलराशि से इच्छाराशि को गुणा करके प्रमाणराशि का भाग देने पर जो प्रमाण हो उतना एक जीव का सादिपुद्गलद्रव्य है। इसको सर्वजीवराशि के प्रमाण से गुणा करने पर जो प्रमाण हो उतना सर्वजीवों का सादिपुद्गलद्रव्य जानना । इस प्रमाण को सर्वपुद्गलद्रव्यराशि के प्रमाण में से घटाने पर जो शेष रहे वह अनादिपुद्गलद्रव्य का प्रमाण है। __इससे यह सिद्ध होता है कि सर्वजीवों के द्वारा भी अतीतकाल में सर्वपुद्गलद्रव्य नहीं भोगा गया। शंका - द्वादशानुप्रेक्षादि ग्रन्थों में जो कहा गया है कि एकजीवने सर्वपुद्गलद्रव्य को अनन्तबार भोगकर छोड़ दिया वह कैसे संभव है? समाधान - उन गाथाओं में 'अस' अर्थात् यहाँ 'कुछ' के लिए 'सर्व' शब्द का प्रयोग हुआ है। जैसे अआरे पर पाँव रखा जाने से पाँव का एक भाग जलता है, तथापि यही कहा जाता है कि पांव जल गया। इस प्रकार एकभाग में भी सर्वका प्रयोग होता है। १. "तीदो संखेज्जावलि हद सिद्धाणं पमाणं तु"।।५७७ || गो.जी. अर्थात् सिद्धराशिको संध्यात आवलियों से गुणा करने पर अतीतकाल का प्रमाण प्राप्त होता है। २. ध. पु. ४ पृ. ३२६
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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