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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१३७ है। उद्योतप्रकृतिके उत्कृष्ट अनुभागबन्ध का स्वामी मिथ्यादृष्टि, सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त, साकार-जागृत, सर्वविशुद्ध, तदनन्तर समय में सम्यक्त्वको प्राप्त होने वाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करनेवाला अन्यतर सप्तमपृथ्वीका नारकी जीव है। अब जघन्य अनुभागबन्ध के स्वामी कहते हैं -
वण्णचउक्कमसत्थं उवघादो खवगधादि पणवीसं।
तीसाणमवरबंधो सगसगवोच्छेद ठाणम्हि॥१७०॥ अर्थ - अशुभवर्णादि चार, उपघात और क्षय होने वाली घातिया कर्मों की पच्चीस अर्थात् ज्ञानावरणादि ५, अन्तराय ५, दर्शनावरण ४, निद्रा, प्रचला, हास्य, रति, भय, जुगुप्सा, पुरुषवेद तथा सज्वलन की ४ कषाय इन ३० प्रकृतियों की जहाँ-जहाँ बन्धव्युच्छित्ति होती है, वहां क्षपकश्रेणीवाले के जघन्य अनुभागबन्ध होता है।
अणथीणतियं मिच्छं मिच्छे अयदे हु बिदियकोधादि।
देसे तदिय कसाया संजमगुणपच्छिदे सोलं ॥१७१ ।। अर्थ - अनन्तानुबन्धी की चार कषाय, स्त्यानगृद्धि आदि तीन और मिथ्यात्व ये आठ प्रकृति मिथ्यात्वगुणस्थान में, अप्रत्याख्यानकी चार कषाय असंयत में, प्रत्याख्यानकी चार कषाय देशसंयत में। इस प्रकार इन गुणस्थानों में ये १६ प्रकृतियाँ संयमगुण को धारण करने के सम्मुख हुआ है। अर्थात् तदन्तर समय में संयम को प्राप्त करेगा ऐसा विशुद्ध परिणामी जघन्यअनुभागसहित बाँधता है।
आहारमप्पमत्ते पमत्तसुद्धे य अरदिसोगाणं ।
णरतिरिये सुहुमतियं वियल वेगुव्वछक्काओ॥१७२॥ अर्थ - आहारकशरीर व आहारकअङ्गोपाङ्ग इन दो शुभप्रकृतियों को प्रमत्तगुणस्थान के सम्मुख हुआ सक्लेशपरिणामवाला अप्रमत्तगुणस्थानवीजीव जघन्यअनुभागसहित बाँधता है। अरति और शोकको तत्प्रायोग्यविशुद्ध प्रमत्तगुणस्थानवी जीव जघन्यअनुभागसहित बांधता है। सूक्ष्म, अपर्याप्त
और साधारण, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, देवद्विक, नरकद्विक, वैकिनकद्धिक का जघन्य नभागसहित बन्ध मनुष्य व तिर्यञ्च करता है।
नोट - देवायु व नरकायु का बन्ध मनुष्य व तिर्यञ्च करता है तथा तिर्यञ्च व मनुष्यायुका बन्ध लब्ध्यपर्याप्तक करता है।
१. महाबन्ध पु.४ पृ. १८८-१८९ पेरा नं.४०९।