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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१३८
सुरणिरये उज्जोवोरालदुगं तमतमम्हि तिरियदुर्ग।
णीचं च तिगदिमज्झिमपरिणामे थावरेयक्खं ॥१७३॥ अर्थ - उद्योत और औदारिकद्विक जघन्यअनुभागसहित संक्लिष्टदेव और नारकीके बंधती है। इनमें से उद्योत प्रकृतिका बन्ध अतिविशुद्धपरिणामीदेवों के नहीं होता अतः संक्लेशपरिणामी के ही जघन्यअनुभागसहित बंधती है इसी कारण उद्योतप्रकृति प्रशस्त है। सप्तमनरक में सम्यक्त्व के अभिमुख | विशुद्धनारकीके तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी और नीचगोत्रप्रकृति जघन्यअनुभागसहित बँधती है। स्थावर व एकेन्द्रिय का जघन्यअनुभागबन्ध नरकबिना शेष तीनगतिवाले तीव्रविशुद्ध व संक्लेशरहित ! मध्यमपरिणामी जीव करते हैं।
सोहम्मोत्ति य तावं तित्थयरं अविरदे मणुस्सम्हि। .
चदुगदिवामकिलिट्टे पण्णस्स दुवे विसोहीये ॥१७४ ॥ अर्थ- आतपप्रकृति जघन्यअनुभागसहित भवनत्रिक और सौधर्मयुगल वाले संक्लेशपरिणामीदेवों के बंधती है। तीर्थङ्करप्रकृति द्वितीय या तृतीयनरक जाने के सम्मुख तथा मिथ्यात्वके सम्मुख असंयतगुणस्थानवी मनुष्य के जघन्यअनुभागसहित बँधती है तथा १५ प्रकृतियाँ चारों गति के संक्लेशीजीवों के एवं दो प्रकृतियाँ चारों गति के विशुद्धपरिणामीजीवों के जघन्यअनुभागसहित बँधती
अब उन १५ और २ प्रकृतियों के नाम कहते हैं -
परघाददुगं तेजदु तसवण्णचउक्क णिमिणपंचिंदी।
अगुरुलहुं च किलिट्टे इस्थिणसं विसोहीये ॥१७५ ॥ अर्थ - परघात, उच्छ्वास, तेजस, कार्मण, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येक, शुभरूप वर्णचतुष्क, निर्माण, पञ्चेन्द्रिय, अगुरुलघु ये १५ प्रशस्त प्रकृतियाँ चारों गति सम्बन्धी संक्लिष्ट जीवों के तथा स्त्रीवेद और नपुंसकवेदरूप दो अप्रशस्तप्रकृतियाँ चारोंगति के विशुद्धपरिणामी जीव जघन्यअनुभागसहित बाँधते हैं।
सम्मो वा मिच्छो वा अट्ट अपरियत्तमज्झिमो य जदि।
परियत्तमाणमज्झिममिच्छादिट्ठी दु तेवीसं ॥१७६ ।। अर्थ - आगे गाथासूत्र में वक्ष्यमाण जो ३१ प्रकृतियाँ हैं उनमें से प्रथम आठ प्रकृतियों को