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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१३६ विशेषार्थ - गाथा १६४ से १६९ तक उत्कृष्टअनुभागबन्ध के स्वामी बताए हैं उसका विशेष ! कथन इस प्रकार है - पाँच ज्ञानावरण, नौ दर्शनावरण, असातावेदनीय, मिथ्यात्व, १६ कषाय, पांच नोकषाय, हुण्डकसंस्थान, अप्रशस्त वर्णचतुष्क, उपघात, अप्रशस्तविहायोगति, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्ति, नीचगोत्र और पाँच अन्तराय इन प्रकृतियों के उत्कृष्टअनुभागबन्ध का स्वामी पञ्चेन्द्रिय, सञी मिथ्यादृष्टि, सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त साकार-जागृत, नियम से उत्कृष्टसंक्लेशयुक्त और उत्कृष्ट अनुभाग बन्ध करने वाला अन्यतर चार गतिका जीव है। सातावेदनीय,यश:कीर्ति और उच्चगोत्र । के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका स्वामी क्षपकसूक्ष्मसाम्परायसंयत और अन्तिम समय में उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर जीव है। स्त्रीवेद, पुरुषवेद, हास्य, रति, चार संस्थान और चार संहनन का भङ्ग मतिज्ञानावरण के समान है, किन्तु विशेषता इतनी है कि यह तत्प्रायोग्य संक्लेशपरिणामवाले जीवके कहना चाहिए। नरकायु, तीन जाति, सूक्ष्म, अपर्याप्त और साधारण के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका स्वामी सर्व पर्याप्तियों से पर्याप्त हुआ, साकार-जागृत, तत्प्रायोग्य संक्लेशपरिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करनेवाला अन्यतर मनुष्य या सञ्जीपञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च जीव है। तिर्यञ्च व मनुष्यायु के सम्बन्ध में भी यही कथन है, किन्तु विशेषता इतनी है कि यहाँ तत्प्रायोग्य विशुद्धपरिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबध करने वाला जीव कहना चाहिए। देवायुके उत्कृष्ट अनुभागबन्ध का स्वामी साकार-जागृत, तत्प्रायोग्य विशुद्धपरिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर अप्रमत्त संयतजीव है। नरकगति व नरकगत्यानुपूर्वी के उत्कृष्ट संक्लेश परिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर मनुष्य या पञ्चेन्द्रियतिर्यञ्च जीव है। मिथ्यादृष्टि, साकार-जागृत, नियम से उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर देव और नारकी तिर्यञ्चगति, असम्प्राप्तासृपाटिकासंहनन और तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वीकै उत्कृष्ट अनुभागबन्धका स्वामी है। सम्यग्दृष्टि साकार, जागृत, सर्वविशुद्ध और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर देव और नारकी जीव मनुष्यगति, औदारिकशरीर, औदारिक अगोपाङ्ग, वज्रर्षभनाराचसंहनन और मनुष्यगत्यानुपूर्वी के उत्कृष्ट अनुभागबन्ध का स्वामी है। देवगति, पञ्चेन्द्रियजाति, वैक्रियकशरीर, आहारकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्र स्थान, वैक्रियकअनोपाज, आहारकअङ्गोपाङ्ग, प्रशस्तवर्णचतुष्क, देवगत्यानुपूर्वी, अगुरुलघु, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्तविहायोगति, सचतुष्क, स्थिर, शुभ, सुस्वर, सुभग और आदेय, निर्माण व तीर्थङ्कर के उत्कृष्ट अनुभागबन्ध का स्वामी अन्यतर क्षपकअपूर्वकरण जो परभवसम्बन्धी नामकर्म की प्रकृतियों का अन्तिम समय में उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करनेवाला है वह जीव है। एकेन्द्रियजाति और स्थावर के उत्कृष्ट अनुभागबन्धका स्वामी मिथ्यादृष्टि, साकार-जागृत, नियम से उत्कृष्टसंक्लेश परिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर सौधर्म और ऐशानकल्प का देव है। आतपप्रकृतिके उत्कृष्ट अनुभागबन्ध का स्वामी सञी, साकार, जागृत तत्प्रायोग्य विशुद्धपरिणामवाला और उत्कृष्ट अनुभागबन्ध करने वाला अन्यतर तीन गतिका जीव
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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