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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - १३५
अब उन ३२ प्रकृतियों के नाम कहते हैं -
उवघातहीणतीसे अपुत्र्वकरणस्स उच्चजससादे । संमेलिदे हवंति हु खवगस्सऽवसेसबत्तीसा ।। १६७ ।।
अर्थ - अपूर्वकरण के छठे भाग में ३० प्रकृतिकी व्युच्छित्ति होती है उसमें से एक उपघातप्रकृतिबिना शेष २९ और उच्चगोत्र, यशकीर्ति तथा सातावेदनीय ये सर्व (२९+३) ३२ प्रकृतियां क्षपकश्रेणीवाले के पूर्व में कहीं सो जानना ।
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मिच्छस्संतिमणवयं णरतिरियाणि वामणरतिरिये । एइंदिय आदावं थावरणामं च सुरमिच्छे ॥ १६८ ॥
अर्थ ८२ अप्रशस्त और आतप, उद्योत, मनुष्यायु, तिर्यञ्चायु इन ८६ प्रकृतियों का तीव्र अनुभागसहित बन्ध मिथ्यादृष्टिजीवके होता है, उनमें मिथ्यात्व गुणस्थान में व्युच्छिन्न १६ प्रकृतियों में से सूक्ष्मादि अन्तिम ९ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बन्ध संक्लेशपरिणामवाले मिध्यादृष्टिमनुष्य व तिर्यञ्च करते हैं और मन्दकषायवाले मनुष्य व तिर्यञ्च मनुष्यायु तथा तिर्यञ्चायुके तीव्र अनुभाग को बाँधते हैं। आयु के अन्तिम छह महीने में मिथ्यादृष्टिदेव संक्लेशपरिणामों से एकेन्द्रिय और स्थावर प्रकृतिका तीव्र अनुभाग को बाँधते हैं। आयु के अन्तिम छह महीने में मिथ्यादृष्टिदेव संक्लेशपरिणामों से एकेन्द्रिय और स्थावर प्रकृतिका तीव्रअनुभाग बन्ध करता है एवं विशुद्धपरिणामों से आतपप्रकृतिका तीव्र अनुभागबन्ध करता है।
नोट - महाबन्ध पु. ४ पृ. १८९ पर आतपके उत्कृष्ट अनुभागबन्ध के स्वामी मनुष्य, तिर्यञ्च और देव इन तीनों को कहा है।
उज्जोवो तमतमगे सुरणारयमिच्छगे असंपत्तं ।
तिरियदुर्ग सेसा पुण चदुर्गादि मिच्छे किलिङ्केय ॥१६९ ।।
अर्थ - तमस्तमनामक सप्तमनरक में उपशमसम्यक्त्व के सम्मुख हुआ विशुद्ध मिथ्यादृष्टिजीव उद्योत प्रकृति को तीव्र अनुभागसहित बाँधता है, क्योंकि अतिविशुद्धता में उद्योतप्रकृति का बन्ध नहीं होता है। असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन और तिर्यञ्चगति, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी को तीव्र अनुभागसहित तीव्रसंक्लेशपरिणामवाले मिध्यादृष्टिदेव, नारकी बाँधते हैं तथा अवशिष्ट ६८ प्रकृतियों को तीव्र अनुभाग सहित चारों गति के संक्लेश परिणामवाले मिथ्यादृष्टिजीव बाँधते हैं।