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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१३४ आगे उत्कृष्ट अनुभागबन्ध के स्वामी कहते हैं - बादालं तु पसत्था विसोहिगुणमुक्कडस्स तिव्वाओ। वासीदि अप्पसत्था मिच्छुक्कड संकिलिट्ठस्स ॥१६४ ।। अर्थ - पूर्वकथित (गाथा ४१-४२ में) ४२ पुण्यप्रकृतियों का तीव्रअनुभागबन्ध विशुद्धतारूप उत्कृष्टपरिणामवाले जीवके होता है और (गाथा ४३-४४ में कथित) असातादि ८२ अशुभप्रकृतियोंका उत्कृष्टअनुभागबन्ध तीव्रसंक्लेशपरिणामवाले मिथ्यादृष्टिजीव के होता है। यहाँ वर्णादिचार प्रकृतियों को प्रशस्तप्रकृतियों में भी लिया गया है और अप्रशस्त में भी गिना गया है। इसकारण बन्धयोग्य प्रकृतियाँ १२० की बजाय १२०+४ = १२४ हो जाती है। आदाओ उज्जोओ मणुवतिरिक्खाउगं पसत्थासु। . मिच्छस्स होति तिव्वा सम्मादिहिस्स सेसाओ॥१६५।। अर्थ - उक्त ४२ प्रकृतियों में से आतप, होत. मनुष्यायु व तिर्यञ्चायुका तीव्रअनुभागबन्ध विशुद्धमिथ्यादृष्टिके होता है तथा अवशेष ३८ प्रकृतियों का तीव्र अनुभाग बन्ध विशुद्धसम्यादृष्टि के होता मणुओरालदुवज्जं विसुद्धसुरणिरयअविरदे तिव्वा । देवाउ अप्पमत्ते खवगे अवसेसबत्तीसा ॥१६६॥ अर्थ – सम्यग्दृष्टिं जिन ३८ प्रकृतियों का नीव (उत्कृष्ट) अनुभागबन्ध कहा था उन में से मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी औदारिकशरीर, औदारिकअङ्गोपाङ्ग, वज्रर्षभनाराचसंहननका तीव्र अनुभागसहित बन्ध अनन्तानुबन्धी की विसंयोजना करने के लिए विशुद्धपरिणामी असंयतसम्यग्दृष्टिदेवनारकीजीव जब तीनकरण करता है तब उनमें से अनिवृत्तिकरण के अन्तसमय में करता है तथा देवायुको तीव्रअनुभागसहित अप्रमत्तगुणस्थानवर्तीजीव बाँधता है। अवशेष ३२ प्रकृतियों को तीव्रअनुभागसहित क्षपकश्रेणीवालाजीव बाँधता है। "शुभ-परिणाम-निवृत्तो योगः शुभः। अशुभ-परिणाम-निर्वृत्तश्चाशुभः । न पुनः शुभाशुभ-कर्म-कारणत्वेन । यद्येवमुच्याते शुभयोग एव न स्यात्, शुभयोगस्यापि ज्ञानावरणादिबन्ध-हेतुत्वाभ्युपगमात्।" (सवार्थसिद्धि ६/३) अर्थ - जो योग शुभपरिणामों के निमित्त से होता है वह शुभ योग है और जो योग अशुभ परिणामों के निमित्त से होता है वह अशुभ योग है। शायद कोई यह माने कि शुभ और अशुभकर्मका कारण होने से शुभ और अशुभयोग होता है सो बात नहीं है, यदि इस प्रकार इनका लक्षण कहा जाता है तो शुभयोगही नहीं हो सकता क्योंकि शुभयोग को भी ज्ञानावरणादि कर्मों के बन्ध का कारण माना है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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