________________
गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१२८
विशेषार्थ - एककोड़ाकोड़ीसागर प्रमाण स्थितिकी आबाधा १०० वर्ष है, उसके १०,८०,००० मुहूर्त होते हैं। इतने मुहूर्तप्रमाण आबाधा एककोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण स्थितिकी है तो एक मुहूर्त आबाधा कितनी स्थिति की होगी?
यहाँ प्रमाणराशि १०,८०,००० मुहूर्त, फलराशि १ कोड़ाकोड़ीसागर और इच्छाराशि १ मुहूर्त है। फलराशि को इच्छाराशि से गुणा करके प्रमाणराशि का भाग देने पर ९,२५,९२,५९२१५ सागरप्रमाण स्थिति में १ मुहूर्त की आबाधा होती है। इसी प्रकार एकसागर की स्थिति आबाधा संख्यातउच्छ्वास मात्र होती है। अथान्तर आयुकर्म की आबाधा कहते हैं -
पुव्वाणं कोडितिभागादासंखेयअद्धवोत्ति हवे।
आउस्स य आबाहा ण ह्रिदिपडिभागमाउस्स ।।१५८॥ अर्थ - आयुकर्म की आबाधा कोटिपूर्वके तीसरे भागसे असंक्षेपाद्धाप्रमाणपर्यन्त है। आयुकर्म की आबाधा में प्रतिभाग (त्रैराशिक) का नियम नहीं है।
विशेषार्थ - आयुकर्म की उत्कृष्टआबाधा कोटिपूर्ववर्ष के तीसरेभाग प्रमाण तथा जघन्य आबाधा 'असंक्षेपाद्धा' प्रमाण है। यह काल भी आवली के संख्यातवें भाग प्रमाण है अत: आयुकर्म की आबाधा इसी प्रकार है, अन्यकर्मों की स्थिति के समान नहीं है।
शंका - असंख्यातवर्ष की जिनकी आयु है उसके त्रिभागप्रमाण आबाधा क्यों नहीं कही?
समाधान - असंख्यातवर्ष की आयुवाले ऐसे देव-नारकी और भोगभूमिजकी तो ६ माह आयु शेष रहने पर आयु का बन्ध होता है तथा कर्मभूमिजमनुष्य-तिर्यञ्चके अपनी सम्पूर्ण आयु के अन्तिम विभाग में आयु बैंधती है। कर्मभूमिजकी उत्कृष्टआयु कोटिपूर्ववर्ष अर्थात् संख्यातवर्षप्रमाण है, अत: उसी का त्रिभाग उत्कृष्टआबाधाकाल कहा। विभाग के आठ अपकर्षकालों में आयुका बन्ध हो सकता है, कदाचित् आठों अपकर्षों में आयुका बन्ध नहीं हुआ तो अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयुके अवशेष रहने पर उत्तरभवकी आयुको अन्तर्मुहर्तकाल के समयप्रबद्ध में बाँधकर निष्ठापन करते हैं तथा असंक्षेपाद्धाकालपर्यन्त विश्राम करते हैं उसके पश्चात् मरण होता है। अर्थात् आयुबंधके बाद विश्राम लिये बिना मरण नहीं होता। यह विश्राम काल जघन्य से भी एक अन्तर्मुहूर्त (अर्थात् असंक्षेपाद्धाकाल) प्रमाण है। फिर मरण हो सकता है। (धवल १०/२७८, ६/१६७, मुख्तार ग्रन्थपृष्ठ ५६९ चरम पेरा) १. आयुकर्म की जघन्यआबाधा से संख्यातगुणा क्षुद्रभव कहा है। इससे स्पष्ट है कि असंक्षेपाडा आवलीका असंख्यातवांभाग
न होकर संख्यातवांभाग है। (धवल पु. ११ पृ. २६९, २७३)