SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 165
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१२७ विशेषार्थ - उदीरणा आबाधा बन्धावली या अचलावली अर्थात् एकावलीप्रमाण होती है। उदयआबाधा एक कोड़ाकोड़ीसागर स्थितिबन्ध की १०० वर्ष प्रमाण होती है। बन्ध के समय इस उदयआबाधाकाल में निषेकरचना नहीं होती, किन्तु अचलावलीकाल के पश्चात् स्थितिअपकर्षण द्वारा इस उदयआबाधाकाल में भी निषेकरचना हो जाती है। इसलिए उदीरणा की आबाधा एकआवली मात्र है। अब इस आबाधा को मूल प्रकृतियों में कहते हैं - उदयं पडिसत्तण्हं आबाहा कोडाकोडि उवहीणं । वाससयं तप्पडिभागेण य सेसहिदीणं च ।।१५६॥ अर्थ - एककोड़ाकोड़ीसागरप्रमाणस्थितिकी आबाधा सौवर्षप्रमाण जानना और शेष स्थितियों की आबाधा इसीके अनुसार प्रतिभाग अर्थात् त्रैराशिकविधि से जो-जो प्रमाण आवे उतनी- उतनी जानना । यह क्रम आयुकर्म के बिना सातकर्मों की आबाधा के लिए उदय की अपेक्षा से है। विशेषार्थ - एककोड़ाकोड़ीसागर स्थिति की १०० वर्ष उदयआबाधा है तो ७० कोड़ाकोड़ीसागरस्थितिकी कितनी आबाधा होगी? इस प्रकार त्रैराशिकविधि करने पर यहाँ प्रमाणराशि एककोड़ाकोड़ीसागर, फलराशि १०० वर्ष, इच्छाराशि ७० कोड़ाकोड़ीसागर है। फलराशि को इच्छाराशि से गुणा करके प्रमाणराशि का भाग देने पर लब्धराशि का प्रमाण ७००० वर्ष आया, यह मिथ्यात्वप्रकृति की उत्कृष्ट उदयआबाधा जानना। इसीप्रकार अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण इच्छाराशि करने पर अपनी-अपनी उदयआबाधाकाल का प्रमाण निकल जाता है। जिन कर्मों की ४० कोड़ाकोड़ीसागर की स्थिति है उनका ४००० वर्ष प्रमाण आबाधाकाल है तथा जिनकी ३० कोड़ाकोड़ीसागरस्थिति है उनकी ३००० वर्ष की आबाधा है इसी प्रकार अन्य प्रकृतियों का भी आबाधाकाल जानना । तथा "सणिण असण्णि चउक्के एगे अंतोमुत्तमबाहा' इस सूत्र से पहले जो द्वीन्द्रियादि की स्थितिबन्धी आबाधा कही है, वही जाननी । आगे अन्तः कोड़ाकोड़ीसागरप्रमाण स्थिति की उदयआबाथा कहते हैं - अंतोकोडाकोडिट्ठिदिस्स अंतोमुत्तमाबाहा। संखेज्जगुणविहीणं सव्वजहण्णट्टिदिस्स हवे॥१५७॥ अर्थ - अन्त: कोड़ाकोड़ीसागर स्थितिकी उदयआबाधा अन्तर्मुहर्त है तथा सर्वजघन्यस्थितियों की उदयआबाधा से संख्यातगुणी हीन है।
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy