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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१२६ घातियाकर्मों की १४, इन १८ प्रकृतियों का अघन्यस्थितिबन्ध सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुवके भेद से | चार प्रकार का है और जघन्यादि तीन भेदों के सादि व अध्रुवरूप दो ही भेद हैं शेष १०२ प्रकृतियों के जघन्यादि चार भेदों के भी सादि और अध्रुवरूप दो भेद हैं।
बन्थरूप उत्तरप्रकृतियों के स्थितिबन्ध की अपेक्षा सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुव भेदों की सन्दृष्टि
___ उत्कृष्ट | अनुत्कृष्ट | जघन्य अजघन्य उत्तरप्रकृति
प्रकृति
१८
उत्तर प्रकृति
नोट - सन्दृष्टि में २ का अङ्ग सादि- अशुदा का अङ्ग सादि-अनादि-ध्रुव-अध्रुव भेदों । को सूचित करता है।
सव्वाओ दु ठिदीओ सुहासुहाणंपि होंति असुहाओ।
माणुसतिरिक्खदेवाउगं च मोत्तूण सेसाणं ॥१५४ ।। अर्थ - मनुष्यायु-तिर्यञ्चायु और देवायु के बिना शेष सर्व शुभ व अशुभप्रकृतियों की स्थिति अशुभरूप ही है। अत: इनप्रकृतियों को बहुकषायीजीव ही उत्कृष्टस्थिति के साथ बाँधता है एवं अल्पकषायीविशुद्धजीव के अल्पस्थितिके साथ इनप्रकृतियों का बन्ध होता है।
विशेषार्थ - तीन आयुके बिना शेष १४५ प्रकृतियों के स्थितिबन्ध में वृद्धि हानि संक्लेशपरिणामों की वृद्धि-हानि पर निर्भर है। संक्लेश, पाप अथवा अशुभरूप है अत: स्थितिबन्ध भी अशुभरूप है। आगे आबाधा का लक्षण कहते हैं -
कम्मसरूवेणागयदव्वं ण य एदिउदयरूवेण ।
रूवेणुदीरणस्स व आबाहा जाव ताव हवे॥१५५॥ अर्थ - कार्मणशरीर नामकर्म के उदय से योगद्वारा आत्मा में कर्मस्वरूप से परिणमता हुआ पुद्गलद्रव्य जबतक उदयरूप अथवा उदीरणारूप नहीं तो तावत्पर्यन्त कालको आबाधा (उदयआबाधा या उदीरणाआबाधा) कहते हैं।