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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१२५ अर्थ - आयुकर्म के बिना सात मूलकों का अजघन्यस्थितिबन्ध सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुवके भेद से चार प्रकार का है तथा आयुकमक बिना शेष सात मूलकर्मों का उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्यस्थितिबन्ध सादि और अध्रुवके भेद से दो प्रकार का ही है। आयुकर्म के चारों ही प्रकार का स्थितिबन्ध सादि एवं अध्रुवके भेद से दो प्रकार का ही है। विशेषार्थ - आयुकर्म के अतिरिक्त शेष सात कर्मोंका जघन्यस्थितिबन्ध क्षपक- श्रेणि में होता है और उपशमश्रेणि में अजघन्यस्थितिबन्ध होता है, किन्तु उपशान्तमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में कषायोदय का अभाव होने से स्थितिबन्ध नहीं होता। वहाँ से गिरने पर पुन: अजघन्यस्थितिबन्ध होने लगता है। इस प्रकार अजघन्यस्थितिबन्ध सादि है तथैव वेदनीयकर्मका अजघन्यस्थितिबन्ध सादि है। ___व्यवहारराशिस्थ जीवों में बन्धरूप मूलप्रकृतियों के स्थितिबन्ध की अपेक्षा सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुव भेदों की सन्दृष्टि - ज्ञानावरण दर्शनावरण | वेदनीय | मोहनीय | आयु | नाम | गोत्र | अंतराय उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट | उत्कृष्ट अनुत्कृष्ट G जघन्य जघन्य | जघन्य | जघन्य | जघन्य जघन्य | जघन्य । जघन्य अजघन्य | अजघन्य अजघन्य | अजघन्य | अजघन्य | अजघन्य | अजघन्य | अजघन्य नोट - संदृष्टि में २ का अङ्क सादि-अध्रुव तथा ४ का अङ्क सादि, अनादि, ध्रुव, अध्रुव को सूचित करता है। अब उत्तरप्रकृतियों में विशेषता कहते हैं - संजलणसुहमचोदस-घादीणं चदुविधो दु अजहण्णो। सेसतिया पुण दुविहा सेसाणं चदुविधावि दुधा॥१५३ ।। अर्थ - सज्वलनचतुष्क तथा सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में व्युच्छिन्न होने वाली ज्ञानावरणादि
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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