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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-११९ एकेन्द्रियजीवसम्बन्धी स्थिति के भेद बा.प.3. सू.प.3. बा.अ.उ. सू.अ.उ. सू.अ.ज. बा.अ.ज. सू.प.ज. बा.प.ज. T- + -- १९६ है। फलराशि को इच्छाराशि से गुणा करने पर तथा प्रमाणराशिका भाग देनेसे जो लब्ध आवे उतने बादरपर्याप्त की उत्कृष्टस्थिति से सूक्ष्मपर्याप्त की उत्कृष्टस्थितिपर्यन्त स्थिति के भेद जानने। यह स्थितिभेदों का प्रमाण बादरपर्याप्त की उत्कृष्टस्थितिबन्ध और सूक्ष्मपर्याप्त का उत्कृष्ट स्थितिबंध के अन्तराल में जितने स्थिति के भेद हैं, उनके समान हैं। इस अन्तराल की १९६ शलाका जानना चाहिए। तथा इस अन्तराल में स्थितिभेदों का जितना प्रमाण कहा उसमें से एक घटाने पर जो कालप्रमाण प्राप्त हो उसे एकसागर (बादरपर्याप्त की उत्कृष्टस्थिति) में से घटाने पर सूक्ष्मपर्याप्त की उत्कृष्टस्थिति का प्रमाण होता तत्पश्चात् प्रमाणराशि ३४३ शलाका, फलराशि एकेन्द्रिय के मिथ्यात्वकी स्थितिभेदों का प्रमाण (पल्यका असंख्यातवाँ भाग), इच्छाराशि २८ शलाका है। फलराशिको इच्छाराशि से गुणाकर प्रमाणराशिका भाग देने पर जो लब्ध आया यह सूक्ष्मपर्याप्तककी उत्कृष्टस्थिति के अनन्तरवर्ती स्थितिबंध से बादरअपर्याप्तकी उत्कृष्टस्थितिपर्यन्त स्थिति के भेदों का प्रमाण होता है। इस अन्तरल में २८ शलाकाएँ जाननी चाहिए। ये जितने भेद हैं उतने समय सूक्ष्मपर्याप्तकी उत्कृष्टस्थिति में से घटानेपर बादरअपर्याप्तकी उत्कृष्टस्थितिका प्रमाण होता है। प्रमाणराशि ३४३ शलाका, फलराशि एकेन्द्रियके मिथ्यात्वकी स्थिति के सर्वभेद (पल्य का असंख्यातवांभाग) और इच्छाराशिरूप शलाका चार, इनमें फलराशिको इच्छाराशि गुणा करके प्रमाणराशिका भाग देने पर जो लब्ध आया उतने बादरअपर्याप्तकी उत्कृष्टस्थिति से सूक्ष्मअपर्याप्तककी उत्कृष्टस्थितिपर्यन्त स्थिति के भेद जानने । इस अन्तराल की चार शलाकाएं हैं ये जितने भेद हुए उतने समय बादर अपर्याप्तकके उत्कृष्टस्थिति बन्धर्म से घटाने पर सूक्ष्मअपर्याप्त का उत्कृष्टस्थितिबन्ध होता है। प्रमाणराशि ३४३, फलराशि एकेन्द्रिय के मिथ्यात्व की स्थिति के सर्वभेदों का प्रमाण (पल्यका असंख्यातवाँभाग), इच्छाराशि शलाका एक । फलराशि को इच्छासशि से गुणाकरके प्रमाणराशि का भाग देने पर जो लब्ध आवे वह सूक्ष्मअपर्याप्त की उत्कृष्ट स्थिति से अनन्तर स्थिति बंध से लेकर सूक्ष्मअपर्याप्तककी जघन्यस्थितिपर्यन्त स्थितिके भेद हैं। इस अन्तरालकी एक शलाका है। ये जितने भेद
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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