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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१०७
अर्थ - लोभ तथा सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान में बन्धनेवाली १७ प्रकृतियोंका जघन्यस्थिति बन्ध मूलप्रकृतियोंके समान है। इनमें यशस्कीर्ति और उच्चगोत्रका तो आठ-आठ मुहुर्त है। सातावेदनीयका १२ मुहुर्त तथा शेष ५ ज्ञानावरण, ४ दर्शनावरण, ५ अन्तराय और सज्वलनलोभका एक-एक अन्तर्मुहूर्त है। संज्वलन क्रोध का दोमास, संज्वलन मानका एकमाह, संज्वलन माया का १५ दिन और पुरुषवेदका आठवर्षप्रमाण जघन्यस्थितिबन्ध होता है।
तित्थाहाराणंतो कोडाकोड़ी जहण्णठिदिबंधो। खवगे सगसगबंधच्छेदणकाले हवे णियमा ।।१४१॥
अर्थ - तीर्थङ्कर और आहारकद्विकका जघन्यस्थितिबन्ध अन्त:कोडाकोडीसागर प्रमाण है। अन्त:कोडाकोडीसागर के अनेकभेद होते हैं इसलिए जघन्यका भी इतना ही प्रमाण है। यह जघन्यस्थितिबन्ध क्षपकश्रेणीवालों के अपनी-अपनी बन्धव्युच्छित्तिके समय आठवें-गुणस्थानके छठेभाग में नियमसे होता है।
भिण्णमुहतो णरतिरियाऊणं वास दसलहस्ताणि । सुरणिरयआउगाणं जहण्णओ होदि ठिदिबंधो॥१४२ ।।
अर्थ - मनुष्यायु और तिर्यञ्चायुका जघन्यस्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त अर्थात् क्षुद्रभव या उच्छ्वासके १८ वें भाग प्रमाण है तथा देवायु और नरकायु का दशहजारवर्षप्रमाण है।
सेसाणं पज्जत्तो बादरएइंदियो विसुद्धो य। बंधदि सव्वजहण्णं सगसगउक्कस्सपडिभागे ।।१४३॥
अर्थ - उपर्युक्त गाथाओं में कथित २९ प्रकृतियों (५ ज्ञानावरण, ४ दर्शनावरण, ५ अन्तराय, यशस्कीर्ति, उच्चगोत्र, सातावेदनीय, संज्वलन चतुष्क, पुरुषवेद, तीर्थङ्कर, आहारकद्विक और चार आयु) के बिना शेष ९१ प्रकृतियों में से वैक्रियकषट्क और मिथ्यात्व इन सातके बिना ८४ प्रकृतियोंका जघन्यस्थितिबन्ध यथायोग्य विशुद्धता का धारक बादरएकेन्द्रियपर्याप्तजीव करता है। अपनी-अपनी उत्कृष्टस्थितिका प्रतिभाग करके त्रैराशिकविधान से जो-जो प्रमाण हो वह-वह जघन्य-स्थितिका प्रमाण जानना।