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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-१०८ मूल-उत्तरप्रकृतियोंकी उत्कृष्ट और जघन्यस्थितिसम्बन्धी सन्दृष्टि प्रकृतियाँ स्थितिबन्ध मूलप्रकृति उत्तरप्रकृति उत्कृष्ट जघन्य साता ज्ञानावरणीय | मतिज्ञानावरणादि पाँच (५)| ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | अन्तर्मुहूर्त दर्शनावरणीय निद्रा-निद्रा, 11 ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | ३/७ सागर* प्रचला-प्रचला व स्त्यानगृद्धि निद्रा व प्रचला ३० कोडाकोड़ी सागरोपम | ३/७ सागर* चक्षु, अचक्षु, - ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | अन्तर्मुहूर्त अवधि व केवलदर्शन। वेदनीय १५ कोड़ाकोड़ी सागरोपम | १२ मुहूर्त असाता ३० कोड़ाकोड़ी सागरोपम! ३/७ सागर* मोहनीय (अ) दर्शनमोहनीय । मिथ्यात्व ७० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | ७/७ सागर" (आ) चारित्रमोहनीय | अनन्तानुबन्धीक्रोधादि चार | ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | ४/७ सागर* (१) कषायवेदनीय अप्रत्याख्यानक्रोधादि चार ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | ४/७ सागर* प्रत्याख्यानक्रोधादि चार ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम ४/७ सागर सवलन क्रोध ४० कोडाकोड़ी सागरोपम २ मास सज्वलन मान ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम १ मास सज्वलन माया ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम १ पक्ष सन्चलन लोभ ४० कोड़ाकोड़ी सागरोपम | (२) नोकषायवेदनीय स्त्रीवेद १५ कोड़ाकोड़ी सागरोपम | २/७ सागर" पुरुषवेद १० कोड़ाकोड़ी सागरोपम ८ वर्ष नपुंसकवेद २० कोडाकोड़ी सागरोपम || २/७ सागर
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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