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. गोम्मटार कर्मकाण्ड-१०६...
एकेन्द्रिय, आतप और स्थावर इन तीनप्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबन्ध मिथ्यादृष्टिदेव करते हैं, शेष १२ प्रकृतियोंको उत्कृष्टसंक्लेशपरिणामवाले तथा ईषत् मध्यमसंक्लेशपरिणामवाले चारों गतियों के जीव बाँधते हैं।
विशेषार्थ - यहाँ उत्कृष्ट और ईषत्मध्यमसंक्लेशपरिणाम का स्वरूप इसप्रकार जानना -
स्थितिबन्धके कारण तीव्रमंदादिकरूप स्थितिबन्धाध्यवसायस्थानों में उत्कृष्टस्थितिबन्ध के लिए कारण ऐसे असंख्यातलोकप्रमाण परिणाम हैं। इनके पल्यके असंख्यातवेंभागप्रमाण खण्ड करके अंतिमखण्ड में तीव्रकषायरूप जो परिणाम हैं उनको उत्कृष्टसंक्लेश कहते हैं तथा प्रधमखण्ड में जितने परिणाम हैं वे अल्पकषायरूप हैं इनको ईषत्सक्लेश कहते हैं एवं दोनों खण्डों के बीच में जो खण्ड हैं उनमें जो परिणाम यथासम्भव पाए जाते हैं उनको मध्यमसंक्लेशपरिणाम कहते हैं। इसीप्रकार उत्कृष्ट से एक-एकसमय घटते हुए जघन्यस्थितिपर्यन्त स्थितिके जितने भेद हैं उन सभी में जानना ।
इन सर्वप्रकृतियों में अपनी-अपनी स्थिति के भेदों का जो प्रमाण है उसे ऊर्ध्वगच्छ कहते है। तिर्यगच्छ पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण और गुणहानिआयाम भी पल्यके असंख्यातवेंभाग प्रमाण होता है। यहाँ अनुकृष्टिरचना का विधान अध:करणवत् जानना चाहिए |
अनुकृष्टिरचना - अङ्कसन्दृष्टि में २२२ परिणाम उत्कृष्टस्थितिबन्ध के कारण हैं। इनकी अनुकृष्टिरचना ५४-५५-५६-५७= २२२ । इनमें से ५७ परिणाम तो उत्कृष्ट स्थितिबन्धके ही कारण हैं, किन्तु ५४ परिणाम (स्थितिबन्धाध्यवसायस्थान) ऐसे हैं जो उत्कृष्टस्थितिबन्धको भी कारण हैं और उससे पल्यके असंख्यातवें भाग हीनतककी स्थितियों के बन्ध के भी कारण हैं तथा ५५ व ५६ परिणाम उत्कृष्टस्थितिबन्ध को भी कारण हैं और उससे हीन स्थितिबन्धको भी कारण हैं। आगे मूलप्रकृतिके जघन्यस्थितिबन्ध को कहते हैं -
बारस य वेयणीये णामागोदे य अट्ट य मुहुत्ता ।
भिण्णमुहुत्तं तु ठिदी जहण्णयं सेसपंचण्हं ॥१३९ ॥ अर्थ - वेदनीयकर्मका जघन्यस्थितिबन्ध बारहमुहूर्तका है, नाम व गोत्रकर्मका आठमुहूर्त है अवशेष पांचकर्मों का जघन्यस्थितिबन्ध एक-एक अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है। अथानन्तर उत्तरप्रकृतियों का जघन्यस्थितिबन्ध कहते हैं -
लोहस्स सुहुमसत्तरसाणं ओघं दुगेकदलमासं। कोहतिये पुरिसस्स य अ य वस्सा जहण्णठिदि॥१४० ॥