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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - १०३
अर्थ ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय और वेदनीयकर्म का उत्कृष्ट स्थिति बन्ध तीसकोड़ाकोड़ीसागर, नाम और गोत्रकर्मका उत्कृष्टस्थितिबन्ध बीसकोड़ाकोड़ीसागर प्रमाण है। मोहनीय कर्म का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सत्तर कोड़ाकोड़ी सागर है, तथा आयुकर्म का केवल ३३ सागरप्रमाण उत्कृष्टस्थितिबन्ध है।
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अथानन्तर छह गाथाओं से उत्तरप्रकृतियों का स्थितिबन्ध कहते हैं
दुक्खतिघादीणोघं सादिच्छीमणुदुगे तदद्धं तु । सत्तरि दंसणमोहे चारित्तमोहे य चत्तालं ॥ १२८ ॥ संठाणसंहदीणं चरिमस्सोघं दुहीणमादित्ति । अट्ठरसकोडकोडी वियलाणं सुहुमतिण्हं च ॥ १२९ ॥ अरदीसोगे संढे तिरिक्खभयणिरयतेजुरालदुगे । वेगुव्वादावदुगे णीचे तसवण्णअगुरुति चउक्के ॥ १३० ॥ इगिपंचेंदियथावणिमिणा सग्गमण अथिरछक्काणं । ari कोडाकोडीसागर णामाणमुक्कस्सं ॥ १३१ ॥ हस्सरदिउच्चपुरिसे थिरछक्के सत्थगमणदेवदुगे । तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहारतित्थयरे ॥ १३२ ॥
सुरणिरयाऊणोघं णरतिरियाऊण तिण्णि पल्लाणि । उक्कस्सट्ठिदिबंधो सण्णीपज्जत्तगे जोगे ।। १३३ ॥ कुलयं ॥
अर्थ असातावेदनीय तथा ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इनकी १९ इस प्रकार सर्वबी प्रकृतियों का उत्कृष्टस्थितिबन्ध मूलप्रकृतियों के समान ३० कोड़ाकोड़ी सागर है । सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वीका उत्कृष्टस्थितिबन्ध १५ कोड़ाकोड़ीसागर है। मिध्यात्वका सत्तरकोड़ाकोड़ी एवं चारित्र मोहनीयरूप सोलहकषाय का उत्कृष्टस्थितिबन्ध ४० कोड़ाकोड़ीसागर है। अन्तिम हुण्डकसंस्थान तथा सृपाटिकासंहननका मूलप्रकृतिके समान २० कोड़ाकोड़ीसागर, वामनसंस्थान और कीलकसंहननका १८ कोड़ाकोड़ीसागर, कुब्जकसंस्थान और अर्धनारचसंहननका सोलह, स्वातिसंस्थान व नाराचसंहननका १४, न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराचसंहननका १२, तथा समचतुरस्रसंस्थान व वज्रर्षभनाराचसंहननका १० कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण उत्कृष्टस्थितिबन्ध है । द्वीन्द्रिय,
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