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माम्मटसार कमकाण्ड-८४ निर्वृत्त्यपर्याप्तकपुरुषवेदी की बन्ध-अबन्ध और व्युच्छित्ति की सन्दृष्टि इस प्रकार
है
गुणस्थान
मिथ्यात्व
बन्धयोग्यप्रकृति ११२ । गुणास्थान ३। बन्ध अबन्ध व्युच्छित्ति विशेष १०७
५ (तीर्थकर, सुरचतुष्क) १३ (गुणस्थानोक्त १६३ नरकद्विक न नरकायु) २४ (गुणस्थानोक्त २५-५. तिर्थञ्चायु) ३७ (२४+१८-५ तीर्थकर, देवचतुष्क) ९ (गुणस्थानोक्त १०-१ मनुष्यायु) .
सासादन असंयत
॥ इति वेद मार्गणा ॥
अथ कषायमार्गणा कषायमार्गणा में क्रोधादि चार कषायबालों के बन्धयोग्यप्रकृति १२० । गुणस्थानक्रोध में क्षपकअनिवृत्तिकरण के दूसरे भागपर्यन्त, मानमें तीसरे भागपर्यन्त, माया में चतुर्थभागपर्यन्त, बादरलोभ में पञ्चमभागपर्यन्त पाए जाते हैं। ८ गुणस्थान तक तो गुणस्थान के समान कथन जानना! क्षपक अनिवृत्तिकरण के प्रथमभाग में पुरुषवेद की बन्ध व्युच्छित्ति अथात् बन्ध २२, अबन्ध ९८, बन्ध व्युच्छित्ति १। दूसरे भाग में संज्वलन क्रोध की बन्ध व्युच्छित्ति अर्थात् बन्ध २१, अबन्ध ९२. बंधव्युच्छित्ति १। तीसरे भाग में संज्वलन मान की बन्धव्युच्छित्ति अर्थात बन्ध २०, अबन्ध ५००, बंधव्युच्छित्ति १। चौथे भाग में संज्वलन माया की बन्धव्युच्छित्ति अर्थात् बन्ध १९, अबन्ध १०५. बन्धव्युच्छित्ति १। पाँचवें भाग में संचलन लोभ की बन्धन्युच्छित्ति अर्थात् बन्ध १८, अबन्ध १.०२. बन्ध व्युच्छित्ति १ तथा सूक्ष्मलोभ में एक सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थान ही है। सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थान में बन्ध १७, अबन्ध १०३, बंध व्युच्छित्ति १६ ।
।। इति कषाय मार्गणा॥