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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८२ ४ प्रकृतिकी, बन्ध ६७ प्रकृतिका एवं अबन्ध ५३ प्रकृतिका है। प्रमत्तगुणस्थान में ब्युच्छित्तिरूप प्रकृति । ६, बन्धप्रकृति ६३ एवं अबन्धप्रकृति ५७ हैं। अप्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छित्ति १ प्रकृतिकी, बन्ध ५९ प्रकृति का, अबन्ध ६१ प्रकृतिका जानना। अपूर्वकरणगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रकृति ३६, बन्धप्रकृति ५८ तथा अबन्धप्रकृति ६२ हैं। अनिवृत्तिकरणगुणस्थान के संवेदनांग में व्युच्छिति एक पुरुषवेदकी, बन्ध । सवेदभाग के द्विचरमसमय तक २२ प्रकृतिका तथा अबन्धरूप प्रकृति ९८ हैं। अनिवृत्तिकरणसम्बन्धी | सवेदभाग में चरमसमय में बन्ध २१ प्रकृतिका एवं अबन्ध ९९ प्रकृतिका है। निर्वृत्त्यपर्याप्तस्त्रीवेदीके बन्धयोग्य प्रकृति चारआयु, तीर्थङ्कर, आहारकद्विक और वैक्रियिकषट्कबिना ५०७ हैं। गुणस्थान मिथ्यात्व और सासादन | मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति नरकद्विक एवं नरकायुबिना १३ प्रकृतिकी, बन्धप्रकृति १०७, अबन्ध रूप प्रकृति शून्य । सासादनगुणस्थानमें तिर्यञ्चायुबिना व्युच्छित्ति २४ प्रकृतिकी, बन्ध ९४ प्रकृतिका एवं अबन्ध १३ प्रकृतिका है। सन्दृष्टि इस प्रकार है - बन्धयोग्यप्रकृति १०७। गुणस्थान २ हैं। गुणस्थान बन्ध | अबन्ध | व्युच्छित्ति विशेष मिथ्यात्व | १०७ / ० । १३ । १३ (गुणस्थानोक्त १६-३ नरकद्विक, नरकायु) | ९४ | १३ | २४ । २४ (गुणस्थानोक्त २५-१ तिर्यञ्चायु) सासादन नपुसंकवेदी के बन्धयोग्यप्रकृति १२०, गुणस्थान १ हैं। सर्व रचना स्त्रीवेदके समान ही जानना। नपुंसकवेदी की निवृत्त्यपर्याप्तावस्था में बन्धयोग्य १०८ प्रकृति हैं। गुणस्थान १-२-४ होते हैं। पूर्वोक्त स्त्रीवेदीकी निर्वृत्त्यपर्याप्तावस्था में जो १०७ प्रकृतिका बन्ध है उसमें नारकअसंयतकी अपेक्षा एक तीर्थङ्करप्रकृति मिलाने से १०८ प्रकृतिका बन्ध है तथा तिर्यञ्चायु और मनुष्यायु का बन्ध लब्ध्यपर्याप्तके ही होता है, किन्तु यहाँ निर्वृत्त्यपर्याप्त का कथन है। इनके मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १३, तीर्थङ्करबिना बन्धप्रकृति १०७, अबन्ध एक तीर्थङ्करप्रकृतिका । सासादन में तिर्यञ्चायुबिना व्युच्छित्ति रूपप्रकृति २४, बन्धप्रकृति ९४ तथा अबन्धरूपप्रकृति १४ । असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति मनुष्यायुबिना ९, बन्ध तीर्थकरसहित ७१ प्रकृतिका और अबन्ध ३७ प्रकृतिका |
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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