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________________ ___ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८१ कार्मणकाययोगसम्बन्धी बन्ध-अबन्धादि के कथन की सन्दृष्टि बन्धयोग्य प्रकृति ११२ । गुणस्थान ४। गुणस्थान बन्ध | अबन्ध व्युच्छित्ति विशेष मिथ्यात्व ५ (तीर्थङ्कर, देवचतुष्क) १३ (गुणस्थानोक्त १६नरकद्विक, नरकायु) २४ (गुणस्थानोक्त २५-१ तिर्यञ्चायु असंयत ७५ । ३७ | ७४ ३७ (२४+१८-५ तीर्थकर व देवचतुष्क) ७४(असंयतसम्बन्धी गुणस्थानोक्त १०-१ मनुष्यायु = ९, देशसंयतकी ४, प्रमत्तकी ६, अपूर्वकरण की ३४ (आहारकद्विकबिना) अनिवृत्तिकरण की ५ और सूक्ष्मसाम्पराय की १६) सयोगी । १ । १११ । १ । १ (सातावे दनीय)। इसकी बन्धव्युच्छित्ति कार्मणकाययोग में नहीं होती है, किन्तु औदारिककाययोग में होती है। सासादन "इति योगमार्गणा” अब वेदमार्गणा से आहारमार्गणापर्यन्त १० मार्गणाओं में बन्ध-अबन्ध और व्युच्छित्ति का कथन करते हैं - - वेदादाहारोत्ति य सगुणट्ठाणाणमोघं तु ॥११९॥ अर्थ - वेदमार्गणासे आहारमार्गणापर्यन्त सामान्यकथन गुणस्थानवत् ही जानना। अर्थात् स्वकीय-स्वकीय गुणस्थान के समान इन १० मार्गणाओं का कथन है। विशेषार्थ - सर्वप्रथम वेदमार्गणा के स्त्रीवेदमें बन्धयोग्यप्रकृतियाँ १२० हैं। गुणस्थान ९ हैं। इनमें मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप १६ प्रकृति, बन्धप्रकृति १५७ और ३ प्रकृतिका अबन्ध है। सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्तिरूप २५ प्रकृति, बन्ध १०१ प्रकृतिका एवं अबन्धप्रकृति १९ हैं। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति शून्य, बन्धरूप प्रकृति ७४, अबन्ध ४६ प्रकृतिका है। असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्न प्रकृति १०, बन्ध ७७ प्रकृतिका एवं अबन्ध ४३ प्रकृतिका है। देशसंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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