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गोम्मटसार कर्मकाण्ड-८० आहारककाययोगसम्बन्धी सर्वकथन प्रमत्तगुणस्थानवत् जानना चाहिए। बन्ध व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ६, बन्धयोग्यप्रकृति ६३ तथा अबन्ध ५७ प्रकृतियों का है।
आहारकमिश्रकाययोगी के व्युच्छित्तिरूप प्रकृति ६, बन्धयोग्य ६२ प्रकृति, क्योंकि यहाँ देवायुका बन्ध नहीं है तथा अबन्धरूप प्रकृतियाँ ५८ हैं। आगे कार्मणकाययोग में बन्ध-अबन्धादिका कथन करते हैं -
कम्मे उरालमिस्सं वा णाउदुगंपि णव छिदी अयदे। अर्थ - कार्मणकाययोग की सर्वरचना औदारिक मिश्रकाययोग के समान है, किन्तु विग्रहगति में आयुका बन्ध न होने से मनुष्यायु व तिर्यञ्चायु के बन्ध का अभाव है। असंयत गुणस्थान में असंयत गुणस्थान संबंधी ९ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है।
विशेषार्थ - कार्मणकाययोग में विग्रहगति में आयुका बन्ध नहीं है अतः तिर्यञ्चायु व । मनुष्यायुबिना बन्धयोग्य ११२ प्रकृतियाँ हैं । गुणस्थान चार हैं। मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छिन प्रकृतियाँ १३, बन्धप्रकृतियाँ १९७ और अबन्ध तीर्थकर व देवचतुष्कका। सासादनगुणस्थान में व्युच्छिन्ति तिर्यञ्चायुबिना २४ की। बन्धप्रकृति ९४ तथा अबन्ध प्रकृतियाँ १८ हैं। असंयतगुणस्थानमें असयंतगुणस्थान की मनुष्यायुबिना व्युच्छिन्नप्रकृति ९, देशसयंतकी ४, प्रमत्तकी ६, अप्रमत्तसम्बन्धी देवायुको यहाँ नहीं गिना, आहारकद्विकबिना अपूर्वकरण की ३४ तथा अनिवृत्तिकरण की ५ एवं सूक्ष्मसाम्पराय की १६ इस प्रकार ७४ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है। बन्धयोग्यप्रकृति सुरचतुष्क व तीर्थङ्करसहित ७५ हैं एवं अबन्ध ३७ प्रकृति का है। सयोगीगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति १, बन्धप्रकृति १ तथा अबन्ध १११ प्रकृतिका है।
नोट - सातावेदनीयकी बन्धव्युच्छित्ति कार्मणकाययोग में नहीं होती है किन्तु औदारिककाययोग में होती है।
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