________________
प्रमत्तसंयत अप्रमत्त अपूर्वकरण अनिवृत्तिकरण | २२ सूक्ष्मसाम्पराय उपशान्तमोह क्षीणमोह सयोगी अयोगी
गोम्मटतार कर्मकाण्ड-६५..................... ६ ६ (गुणस्थानोक्त)
६१ (६३-२ आहारकद्विक) १ (देवायु) ३६ (गुणस्थानोक्त) ५ (गुणस्थानोक्त) १६ (गुणस्थानोक्त) १ (सातावेदनीय) | १ (सातावेदनीय) | ५ (व्युच्छित्तिरूप सातावेदनीय)
सामान्य-पर्याप्तमनुष्य तथा मनुष्यनी के निर्वृत्त्यपर्याप्तावस्था में बन्धयोग्य ११२ प्रकृति हैं। ये तीनों मिश्रकाययोगी निर्वृत्त्यपर्याप्तक हैं, अत: यहाँ चारआयु, नरकद्रिक, आहारकद्विक इन आठप्रकृति का बन्ध नहीं है। गुणस्थान मिथ्यात्व, सासादन, असंयत, प्रमत्त और सयोगी ये पांच हैं।
यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में, गुणस्थानोक्त १६ में से नरकद्विक व नरकायुबिना १३ प्रकृति व्युच्छिन्न होती हैं देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअनोपान व तीर्थङ्कर बिना बन्धयोग्य प्रकृति १०७, अबन्धप्रकृति ५ । सासादनगुणस्थान में पूर्वोक्त ३१ में से मनुष्य-तिर्यंचायु बिना २९ प्रकृति व्युच्छिन्न होती हैं, बन्धप्रकृति ९४, अबन्ध १८ प्रकृतियों का। असंयतगुणस्थान में व्युच्छित्ति अप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यानरूप चार-चारकषाया (८ प्रकृति) की होती है, सुरचतुष्क और तीर्थक्करसहित बन्ध ७० का, अबन्धप्रकृति ४२। प्रमत्तगुणस्थान में व्युच्छित्ति प्रमत्तसम्बन्धी ६, (अप्रमत्तसम्बन्धी देवायु भी यहाँ बन्ध में नहीं है) अपूर्वकरण की आहारकद्विक बिना ३४, अनिवृत्तिकरण की ५ और सूक्ष्मसाम्परायसम्बन्धी १६, इन सर्व (६+३४+५+१६) ६१ प्रकृतियों की होती है, बन्धप्रकृति ६२ तथा अबन्धप्रकृति ५० हैं। सयोगीगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति एकसातावेदनीय, बन्धप्रकृति एकसातावेदनीय, अबन्धप्रकृति १११३ यहाँ इतनी विशेषता है कि मनुष्यनी के चतुर्थ व षष्ठगुणस्थान नहीं होता क्योंकि सम्यक्त्व सहित मनुष्यनी में उत्पत्ति नहीं होती है और भावस्त्रीवेद वाले जीव के प्रमत्तसंयतगणुस्थान में आहारकद्विक का उदय नहीं होता है अर्थात् उन जीवों के आहारक ऋद्धि की उत्पत्ति नहीं होती है।