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गोम्मटसार कर्मकाण्ड - ६३
सामान्यादि चारों प्रकारके तिर्यञ्चोंकी निर्वृत्त्यपर्याप्तावस्था में बन्ध-योग्य प्रकृति ११९ हैं, क्योंकि इनके निर्वृत्ति अपर्याप्तावस्था में चारआयु और नरकद्विक का बन्ध नहीं होता अतः पूर्वोक्त ११७ में से ये छह कम करने पर १११ प्रकृति बन्धयोग्य रहीं। मुस्थान तीन हैं।
यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में गुणस्थानोक्त व्युच्छिन्न १६ प्रकृति में से नरकायु और नरकद्रिक बिना १३ प्रकृति व्युच्छित्तिरूप हैं । बन्धयोग्य प्रकृति १०७ हैं, क्योंकि मिथ्यात्व व सासादनगुणस्थानवर्ती अपर्याप्त के देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर, वैक्रियिकअङ्गोपाङ्ग का बन्ध नहीं होता, अबन्धरूप प्रकृति ४ हैं । सासादनगुणस्थान में पूर्वोक्त ३१ में से तिर्यञ्च मनुष्यायु बिना २९ की व्युच्छित्ति, मिथ्यात्वगुणस्थान की व्युच्छिन्न १३ प्रकृतियाँ कम करने पर बन्धयोग्य प्रकृति ९४ और अबन्ध १७ प्रकृति का है। असंयत गुणस्थान में व्युच्छित्ति अप्रत्याख्यान की ४ कषाय, पूर्वोक्त व्युच्छित्र प्रकृति कम करके और सुरचतुष्क के मिलाने से ६९ प्रकृति का बन्ध, अबन्धप्रकृति ४२ ।
लब्ध्यपर्याप्त बिना शेष चार प्रकार के तिर्यञ्च सम्बन्धी निर्वृत्यपर्याप्त अवस्था की संदृष्टि
बन्धयोग्य प्रकृति १९९ । गुणस्थान तीन ।
मिध्यात्व
सासादन
असंयत
गुणस्थान बन्ध
अबन्ध
बन्ध
प्रकृति प्रकृति व्युच्छित्ति
प्रकृति
१०७ ४
९४
१७
६९
४२
१३
२९
४
विशेष
४ (सुरचतुष्क) १३ (१६- ३ नरकद्विक, नरकायु) २९ (३१-२ तिर्यंच, मनुष्यायु)
४२ (४६-४ सुरचतुष्क का बंध होने से। किन्तु योनिनी तिर्यंच के यह गुणस्थान नहीं होता ) ४ ( अप्रत्याख्यान कषाय )
लब्ध्यपर्याप्त तिर्यञ्चों के नरकायु-नरकद्विक- देवायु- देवद्विक और वैक्रियिकद्विक इन ८ प्रकृति बिना (१९१७-८) १०९ प्रकृति का बन्ध होता है । यहाँ एक मिथ्यात्वगणुस्थान ही है।
अथानन्तर मनुष्यगतिसम्बन्धी बन्ध- अबन्ध बन्धव्युच्छित्तिरूप प्रकृतियों को कहते
तिरियेव णरे णवरि हू तित्थाहारं च अत्थि एमेव । सामण्णपुण्णमणुसिणिणरे अपुण्णे अपुण्णेव ॥ ११० ॥