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________________ गोम्मटसार कर्मकाण्ड-६२ सामण्णतिरियपंचिंदियपुण्णगजोणिणीसु एमेव । सुरणिरयाउ अपुण्णे वेगुब्वियछक्कमवि णत्थि ॥१०९॥ अर्थ - सामान्य, पञ्चेन्द्रिय, पर्याप्त, योनिनी और लब्ध्यपर्याप्तके भेदसे तिर्यञ्च पाँच प्रकार के हैं। प्रथम चारप्रकार के तिर्यञ्चों में तो पूर्वगाथा में कहे अनुसार बन्धव्युच्छित्त्यादि जानना, किन लब्ध्यपर्याप्ततिर्यञ्च में देवायु-नरकायु और वैक्रियिकषट्क (देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, नरकगति नरकगत्यानुपूर्वी, वैक्रियिकशरीर-क्रियिकअनोपाज) इन आठ का बन्ध नहीं होता है। क्योंकि इन जो प्रकृतियाँ आगामी भव में उदय के योग्य नहीं हैं, उनका यहाँ बन्ध नहीं होता। विशेषार्थ - सामान्यादि चार प्रकार के तिर्यञ्चों के मिथ्यात्वादि गुणस्थानों में बधयोग्य ११० प्रकृति हैं तथा गुणस्थान आदि के पाँच हैं। यहाँ मिथ्यात्वगुणस्थान में व्युच्छित्ति १६ प्रकृति की, बन्धप्रकृति ११७, अबन्ध नहीं है। सासादनगुणस्थान में व्युच्छित्ति २५ तथा असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्न होने वाली वज्रर्षभनाराचसंहनन, औदारिकशरीर-औदारिक अङ्गोपाङ्ग, मनुष्यगतिमनुष्यगत्यानुपूर्वी और मनुष्यायु इन ३१ प्रकृतियों की व्युच्छित्ति होती है। यहाँ बन्धप्रकृति १०१ और अबन्धरूप प्रकृति १६ हैं। मिश्रगुणस्थान में व्युच्छित्ति का अभाव है, बन्ध देवायु बिना पूर्वोक्त ६९ प्रकृति तथा अबन्ध ४८ प्रकृति का। असंयतगुणस्थान में व्युच्छिन्नप्रकृति अप्रत्याख्यानकषाय ४, बन्ध । देवायु सहित ७० और अबन्ध ४७ का। देशसंयत में व्युच्छित्ति प्रत्याख्यानकषाय चार, बन्ध ६६ और अबन्ध ५१ प्रकृति का जानना । लब्ध्यपर्याप्त बिना शेष चार प्रकार के तिर्यञ्चसम्बन्धी बन्ध-अबन्ध-व्युच्छित्ति की संदृष्टि बन्धयोग्य प्रकृति ११७ । गुणस्थान आदि के ५ गुणस्थान| बन्ध अबन्ध बन्ध व्युच्छित्ति विशेष विवरण मिथ्यात्व सासादन ३१ मिश्र असंयत १६(गुणस्थानोक्त) ३१ [२५+६ (वर्षभनाराचसंहनन, । औदारिकद्विक, मनुष्यद्विक, मनुष्यायु)] ४७ (३१+१६+१ देवायु) ४७ (४८-१ देवायु) ४ (अप्रत्याख्यानकषाय) ४ (प्रत्याख्यानकषाय) देशविरत
SR No.090180
Book TitleGommatasara Karma kanda
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherShivsagar Digambar Jain Granthamala Rajasthan
Publication Year
Total Pages871
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Discourse, Philosophy, & Religion
File Size20 MB
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