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________________ ६६ / गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ५७-५८६८ प्रथम समय में निवृत्त हुई प्रत्येक कषाय को तीन-तीन संग्रहकृष्टियों में से लोभ की जधन्यकृष्टि सबसे मन्द अनुभाग वाली है, द्वितीयकृष्टि अनन्तगुरण है। इस प्रकार अनन्तगुणितश्रेणी से प्रथम संग्रहकृष्टि की अन्तिम कृष्टि तक जानना चाहिए । प्रथम संग्रहकृष्टि की अन्तिमकृष्टि से द्वितीय संग्रहकृष्टि की जघन्यकृष्टि अनन्तगुणी है। यह गुणाकार बारहों ही संग्रहकृष्टियों के स्वस्थान गुणाकारों से अनन्तगुरणा है । प्रथम संग्रहकुष्टि में जो कम है वही क्रम द्वितीयसंग्रह कृष्टि में भी है । प्रथम संग्रहकृषि से द्वितीयसंग्रहकृष्टि की जघन्यकुष्टि के अनुभाग में जिस अनन्तगुणे का अनुपात था वही अनुपात द्वितीयसंग्रहकृष्टि से तृतीयसंग्रहकृष्टि की जघन्यकृष्टि में जानना चाहिए। इस प्रकार से लोभ की तीन संग्रहकृष्टियाँ हैं । लोभ की तृतीयकृष्टि की अन्तिमकृष्टि से माया का जघन्यकृष्टिगत अनुभाग अनन्तगुणा है । माया की भी उसी क्रम से तीन संग्रह कृष्टियाँ होती हैं। माया की तृतीय संग्रहकृष्टि की अन्तिम कृष्टि से मान की जघन्यकृष्टि का अनुभाग अनन्तगुणा है। मान की भी उसी क्रम से तीन संग्रहकृष्टियां होती हैं। मान की तृतीय संग्रहकृष्टि की अन्तिमकृष्टि से क्रोध की जघन्य कृष्टि का अनुभाग अनन्तगुणा है। क्रोध की भी तीन संग्रहकृष्टि उसो क्रम से होती हैं । क्रोध की arata fष्ट की अन्तिम कृष्टि से लोभ के प्रपूर्वस्पर्धकों की जघन्य (आदि ) वर्गणा अनन्तगुणी है ।" कृष्टि सम्बन्धी गुणाकारों का अल्पबहुत्व इस प्रकार है एक-एक संग्रहकृष्टि में अनन्तकृष्टियों होती हैं और उनके अन्तर भी अनन्त होते हैं । उन श्रन्तरों की कृष्टिअन्तर यह संज्ञा है । संग्रहकृष्टियों के संग्रहकृष्टियों के अधस्तन उपरिम अन्तर ग्यारह होते हैं। उनकी संज्ञा 'संग्रहकृ ष्टिअन्तर है। लोभ की प्रथम संग्रहकृष्टि में जघन्यकृष्टिप्रन्तर अर्थात् जिस गुणाकार से गुरिणत जघन्यकृष्टि अपनी द्वितीयष्टि का प्रमाण प्राप्त करती है, वह गुणाकार सबसे कम है, इससे द्वितीय कृष्टि का अन्तर अनन्तगुणा है । इसी प्रकार अनन्तर - अनन्तररूप से जाकर अन्तिम कृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है। लोभ को ही द्वितीय संग्रहकृष्टि में प्रथमकृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है। इस प्रकार श्रनन्तरअनन्तर रूप से अन्तिम कृष्टि अन्तर पर्यन्त अनन्तगुणा गुणाकार जानना चाहिए। पुनः लोभ की ही तृतीयसंग्रहकृष्ट में प्रथम कृष्टि श्रन्तर अनन्तगुणा है। इस प्रकार अनन्त र अनन्तर रूप से जाकर अन्तिम कृष्टि अन्तर ( गुरणाकार ) अनन्तगुरणा है । यहाँ से प्रागे माया की प्रथम संग्रहकृष्टि में प्रथम कृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है। इस प्रकार अनन्तरः अनन्तररूप से माया की भी तीनों संग्रहकृष्टियों के कृष्टि अन्तर यथाक्रम से अनन्तगुरिंगतश्रेणी के द्वारा ले जाने चाहिए। यहां से आगे मान की प्रथम संग्रहकृष्टि में प्रथम कृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है । इस प्रकार मान की भी तीनों संग्रहकृष्टियों के कृष्टि अन्तर यथाक्रम से अनन्त - गुणितश्रेणी के द्वारा ले जाने चाहिए। यहाँ से प्रागे क्रोध की प्रथम संग्रहकृष्टि में प्रथम कृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है । इस प्रकार क्रोध की भी तीनों संग्रहकृष्टियों के कृष्टि अन्तर यथाक्रम से अन्तिम अन्तर तक अनन्तगुणित श्रेणी के द्वारा ले जाने चाहिए । इन स्वस्थान गुणाकारों के अन्तिम गुणाकार से लोभ की प्रथम संग्रहकृष्टि का अन्तर अनन्तगुणा है। इससे द्वितीय संग्रहकृष्टिअन्तर अनन्तगुणा है और इससे तृतीय संग्रहकृष्टि अन्तर अनन्तगुणा है। लोभ और माया का अन्तर अनन्तगुणा है । माया का प्रथम संग्रहकृष्टि अन्तर अनन्तगुरणा है। इससे द्वितीय संग्रहकृष्टि १. क. पा. चुसूित्र ५६१ से ३०७ । २. क. पा. चूणिसूत्र ६०८ से ६२० । ३. क. पा. सूत्र ६२१-६२६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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